CONCEPT OF “RANJAK PITTA” ; A KIND OF AYURVEDIC FUNDAMENTALS TRIDOSHA PITTA-DOSHA BHED ; IN VIEW OF ANATOMY AND PHYSIOLOGY AND HOMOESTASIS ; आयुर्वेद सिध्धान्त त्रिदोष पित्त-भेद “रन्जक-पित्त” का शरीर रचना और शरीर कार्य के आलोक मे विवेचन”रन्जक पित्त” के बारे मे


आयुर्वेद के सिध्धन्तो का निर्धारण आयुर्वेद के ग्यानियो ने बहुत विवेक के साथ और बहुत सूक्षम स्तर पर विवेचना करने के उपरान्त जिस तरह से स्थापित किया है , वह उस समय के आयुर्वेद के ग्यानियो के विग्यान सम्मत होने की बात आज के युग मे ANATOMY & PHYSIOLOGY के अध्ध्य्यन करने और उसको CO-RELATE करने से प्राप्त एक-रूपता और समानता से आयुर्वेद के सिध्धान्तो की पुष्टि होती है /

“रन्जक पित्त” आयुर्वेद का एक त्रिदोष भेद है जो पित्त दोष के अन्तर्गत आता है /

पित्त दोष आयुर्वेद के तीन मूल सिध्धान्तो मे से एक है जो आयुर्वेद की बुनियाद है और यह दोष शारीरिक और ्मानसिक level  की “अग्नि” और “तापक्रम”  से समब्नधित होती है /

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रन्जक पित्त इसी पित्त का कार्य और शरीर के अन्दर उपस्तिथि के निर्धारण हेतु पान्च sub-division  मे बान्ट दिया गया है /

ये पान्च पित्त भेद निम्न प्रकार से जाने जाते है /

१- साधक पित्त

२- रन्जक पित्त

३- पाचक पित्त

४- भ्राजक पित्त

५- लोचक पित्त

जैसा कि आयुर्वेद के ग्रन्थो मे बताया गया है कि रन्जक पित्त के क्या कार्य है और यह कहां शरीर के अन्दर रहता है / आज के ANATOMY  और  PHYSIOLOGY   के दृष्टिकोण से देखा जाय तो प्राचीन काल मे आयुर्वेद के ग्यानियो ने जितना भी  Observe  किया है , वह सब सही प्रतीत होता है जैसा कि आधुनिक काल के PHYSIOLOGISTS कहते है /

प्राचीन काल के आयुर्वेदग्यो ने रन्जक पित्त के बारे मे  शरीर रचना यानी ANATOMY और तत्सम्बन्धित  PHYSIOLOGY   के हिसाब से बताया है कि यह पित्त भेद यकृत LIVER और प्लीहा  SPLEEN मे रहता है /

नीचे बताया गया है कि किस तरह आयुर्वेद के ग्यानियो यह निर्धारित करने मे सफलता पायी है कि शरीर के किस हिस्से मे “पित्त” का वास है या पित्त रहता है /

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शरीर कार्य-विधान  PHYSIOLOGY  के हिसाब से इसका काम रस [ process of ANABOLISM —–> METABOLISM को राग -रक्त वर्ण- प्रदान  ASSIMILATION –  NOURISHMENT करना है, ऐसा आयुर्वेद के ग्यानियो का मत रहा है /

आयुर्वेद मे बताये गये रन्जक पित्त का यह CONCEPT आधुनिक  HUMAN PHYSIOLOGY का नियम  HOMEOSTASIS से prove  होता है कि LIVER और SPLEEN  का सन्युक्त कार्य आयुर्वेद के रन्जक पित्त से बहुत कुछ मिलता जुलता है /

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आधुनिक आध्ध्यनो द्वारा  एकत्र किये गये   नीचे दिये गये विवरण को देखने से पता चलता है कि SPLEEN का कार्य कितना महत्व्पूर्ण है और यह किस तरह  से पूरे शरीर को सुरक्षित रखती है और जीवन को बचाती है /

नीचे दी गयी अध्ध्य्यन लिस्ट से पता चलता है कि शरीर के कई महत्व पूर्ण सिस्टम SPLEEN  और इसके कार्यो से किस तरह से प्रभावित होते है ?

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LIVER  के कार्य और इसकी उपयोगिता तथा पाचन सन्स्थान मे किस तरह का योगदान है यह निम्न शीट को देखने से पता चलता है /

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ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि सुश्रुत सम्हिता मे बयान किया गया है कि “शवाच्छेदन” DISSECTION of HUMAN BODY किस तरह से करना चाहिये और इसके लिये किस तरह की तैयारिया करना चाहिये / जिस तरह से वरणन किया गया है और मानव शरीर के अध्ध्य्यन को किस तरह से समझना चाहिये इसका विधिवत PRACTICAL DESCRIPTION  ग्रन्थ मे महर्शि सुश्रुत द्वारा किया गया है / अति प्राचिन काल मे जब आयुर्वेद का अध्ध्य्यन किया जाता होगा तो उस समय उपलब्ध जितने भी साधन होन्गे समय और काल के हिसाब से वह अति आधुनिक कहे जाते होन्गे /

आधुनिक या वर्तमान युग मे ठीक वही HUMAN BODY DISSECTION की  विधिया अपनायी जा रही है जैसा कि BASIC CONCEPT  आयुर्वेद   मे बताया गया है जिसे समय के अनुसार MODIFY  कर दिया गया है जैसा कि available material  आज मिल रहा है उसी तरह से DISSECTION  की विधिया भी समयानुकूल परिवर्तित हो चुकी है /

प्राचीन काल मे निदान के लिये जितने भी उपाय हो सकते थे आयुर्वेद के महर्षियो ने उनका निर्माण करके जैसा अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता था , आयुर्वेद के ग्यानियो ने इस सबका उपयोग किया है और अपने ग्यान और analysis और synthesis  के .बल पर रोगो के निदान मे सफलता पायी है जो आज तक ठीक उसी बुनियाद पर सही और सटीक है जैसा कि उस समय प्रचिलित था /

उदाहरण के लिये डायबिटीज या  DIABETES को लेते है /  ………………………………..

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यहा डायबिटीज  का  उदाहरण देने का मतलब यही है कि प्राचीन काल के आयुर्वेद के ग्यानी जितना observation  कर चुके है वह अक्षरश: सही है और उसमे कही भी कोई गलती की आशन्का नही है / यह अवश्य हो सकता है कि ग्यानियो ने जो observations  किये है उनमे कुछ फेर बदल की जा सकती है लेकिन उसे नकारा नही जा सकता है / डायबिटीज के बारे मे प्राचीन ग्यानियो को जितना ग्यान था उन्होने सारी दुनियां को दिया / आज के ग्यानियो ने उस  प्राचीन सन्चित ग्यान को अपने हिसाब से और अपने  Observation  और experiments  से जितना तजुर्बा हासिल किया है , उस हिसाब से और ज्यादा बढा दिया है यानी पुराने ग्यान मे इजाफा कर दिया है /

यही सूरते हाल कमोवेशी आयुर्वेद के सिध्धान्तो पर भी लागू होती है / आज हमारा ग्यान प्राचीन काल से लेकर अब तक कफी बढ गया है , पुराने ग्यान . को आधार माना जा सकता है या इसे initial stage  का निदान ग्यान माना जा स्कता है  जो बाद मे समय के साथ साथ अधिक evidence के साधन पैदा हो जाने के कारण और मशीने तथा केमिकल परीक्षण और माइक्रोस्कोपिक परीक्षण की विधिया ईजाद हो जाने के कारण अधिक से अधिक उन सभी विष्यो पर ग्यान सूच्ष्म से चूच्छ्म्ता की ओर बढता जा रहा है / इसे केवल ग्यान का  extension   कहा    जा सकता है   / इसे केवल एक उदाहरण से समझा जा सकता है / जब तक चन्द्रमा के बारे मे ्जानकारी नही थी तन तक चन्द्रमा सबके मामा थे / चीन के हवाई पटाखो से यह समझ मे आया कि इसके सहारे दूर तक जाया जा सकता है / अगर पेट्रोल न होता तो इन्जन न बनता / इसी खोज बीन मे राकेट का निर्माण हुआ और धरती से बाहर जाकर समझने का मौका मिला कि वहा क्या है ? बाद मे इसी ग्यान के सहारे मनुष्य चन्द्रमा पर उतर गया और कुछ घन्टे वहा पर बिताये / यह ऐसे ही नही हुआ / यह हमारा ग्यान और हमारे जान लेने की उत्सुकता के कारण ऐसा हुआ है / यही हाल आयुर्वेद के निदान ग्यान और आज के निदान ग्यान के बीच के अन्तर का है /

“रन्जक पित्त” के बारे मे मेरा मानना है कि शरीर के शवच्छेदन करने के बाद आयुर्वेद के ग्यानियो ने यह पाया होगा कि abdominal arota  से लीवर और स्प्लीन की ओर जाने वाली arteries की branches के  कारण ऐसी धारणा बन गयी होगी कि यह रस यानी assimilate  किये गये sunstances  का खून मे मिलाकर सारे शरीर को nourish   करने का रास्ता है pathway  है / इसीलिये आयुर्वेद के ग्यानियो ने बहुत सन्क्षिप्त मे “रन्जक पित्त को रस और रक्त और राग title  से सम्बोधन किया है / यानी रन्जक पित्त के कार्य assimilation  और heamatics  और सारे शरीर मे VITAL NUTRIENTS पहुचाने  वाला माना गया /

आज के ग्यान और प्राचीन ग्यान मे  PHYSIOLOGY  के हिसाब से  बहुत कुछ समानता मिलती है / आधुनिक PHYSIOLOGICAL RESEARCH   से  इसकी  पुष्टि होती है /

LIVER  और SPLEEN दोनो अन्गो   की संरचना और कार्य को यदि समझा जाता है और इनके HOMOEOSTATIS  को समझा जाता है तो सब सम्झ मे आता है कि “रन्जक पित्त” का कार्य निर्धारण आयुर्वेद के ग्यानियो के दृष्टिकोण से कितना सही साबित होता है /

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