महीना: दिसम्बर 2014

EAR INTERNAL AND OUTER PROBLEMS ; WELL TREATED BY HOMOEOPATHY AND AYURVEDA THERAPIES ; कान के अन्दर और कान के बाहर के रोगो का आयुर्वेदिक और होम्योपैथी चिकित्सा द्वारा सटीक और अचूक इलाज सम्भव


कान के अन्दर और कान के बाहर के होने वाले रोगो के इलाज के बारे मे अकसर कुछ चिकित्सको द्वारा भ्रम पैदा किया जा रहा हे कि अगर इनका इलाज उनके चिकित्सा बिग्यान मे नही है तो फिर कही नही है /

कुछ चिकित्सक इस तरह की भ्रान्तिया पैदा कके मरीजो को डरा देते है / ऐसे चिकित्सक मरीजो को सलाह देते है कि यहा या वहा सर्जिकल होम मे जाकर आप्रेशन करा डाले तो उनकी समस्या का समाधान हो जायेगा /

बहुत से ऐसे मरीज आये है जिन्होने अपने कान की तकलीफ से निजात पाने के लिये कान का आपरेशन कराया लेकिन उसके बाद भी उनकी तकलीफ ठीक नही हुयी बल्कि और अधिक होने लगी और  और कई नते किस्म की तकलीफे पैदा हो गयी जिनके लिये लोग मेरे पास इलाज के लिये आये / यहा तक तो गनीमत थी जिन छोटी उम्र वलो का कान का आप्रेशन कर दिया गया उसके बाद इन्छोटी उमर वालो का हाल बेहाल हो जाता है / किसी को पर्मानेन्ट सिर दर्द की शिकायत हो जाती है / किसी का दिमाग कमजोर पड़्ने लगता है / किसी को चक्कर आने की तकलीफ होने लगती है किसी को कल्का बुखार बना रहता है किसी को नाक की बीमारी हो जाती है किसी को गले की और किसी किसी को भूख समाप्त हो जाती जै / इसके अलावा बहुत तरह की तकलीपे पैदा हो जाती है /

वास्तविकता यह है कि अपने देश मे कई तरह की मान्यता प्राप्त चिकित्सा विग्यान द्वारा इलाज करने की सुविधाये प्राप्त है / विदेशो मे ऐसा नही है / विदेशो मे सिवाय एलोपैथी यानी आधुनिक चिकित्सा विग्यान के अलावा कोई दूसरी चिकित्सा पध्ध्यति प्रचिलित नही है / इसलिये इस चिकित्सा विग्यान के चिकित्सको को दूसरी चिकित्सा पध्ध्यतियो के बारे मे “जानकारी नही के बराबर “ है / जब ऐसे चिकित्सको को  जानकारी ही नही होगी कि जिस रोगी की  बीमारी को ला-इलाज बताये दे रहे है और वे कह रहे है कि इसका कोई इलाज नही है वे वास्तव मे रोगी को भ्रमित करते है /

ऐसा वे जान बूझ कर नही करते है    वे कर रहे है

[ अभी मैटर बाकी है ]

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GARLIC ; AYURVEDA OBSERVATION SINCE CENTURIES PROVED CORRECT BY MODERN OBSERVERS STUDIES ; लहसुन ; रासोन ; आयुर्वेद की शताब्दियो पहले किये गये अध्ध्य्यन का आधुनिक अध्ध्य्यनो द्वारा सहमति


लहसुन अधिकतर भारतीय पाक विग्यान मे खाद्य पदार्थो के पकाने और स्वाद बनाने के लिये मसाले के तौर पर उपयोग करते है / घरेलू चिकित्सा के लिये भी लहसुन का उपयोग यदा कदा जानकार लोग करते है / चिकित्सा कार्य  मे  रोगी को सहायता देने के लिये इसका उपयोग करते है / अधिकतर इसका उपयोग दर्द या वायु के दर्द को   आराम करने के लिये  करते है / इसकी लुगदी बनाकर और सरसो या तिल के तेल मे मिलाकर आग मे पकाते है जब तक लहसुन को जला नही देते है / ऐसे तेल को आखरी मे छान कर दर्द के स्थान पर चुपड़्ते है और हल्की मालिश करते है / इस तरह से प्राप्त तेल को अच्छी तरह फिल्टर करके और गुन्गुना गरम करके एक या दो बून्द कान मे डालते है ताकि कान के दर्द मे आराम मिले /

आयुर्वेद मे लहसुन का औषधीय उपयोग किया जाता है / बहुत से ऐसे आयुर्वेद के फार्मूले है जिनमे लहसुन का उपयोग मुख्य द्रव्य के स्वरूप मे होता है / लेकिन लहसुन का उपयोग औषधि मे जब किया जाता है तो सबसे पहले लहसुन का शोधन किया जाता है यानी लहसुन क purification  करते है /

औषधीय उपयोग के लिये लहसुन का प्रयोग अशुध्ध अवस्था मे नही करने का आयुर्वेद मे विधान है / दवाये बनाने के लिये शुध्ध लहसुन का उपयोग करते है / आयुर्वेद कहता है कि अशुध्ध लहसुन का प्रयोग आयुर्वेद औषधियो को बनाने मे न किया जाये / शुध्ध किये गये लहशुन का उपयोग औषधि के निर्माण मे क्रना चाहिये /

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ऊपर के चित्र मे लहसुन की एक गुच्छेदार पोथी और छिलका निकाला हुआ लहसुन और लहसुन को दो हिस्सो या भागो मे बान्टकर या काटकर इसके बीच के कडे हिस्से को अलग करके दिखया और बताया गया है /

आयुर्वेद मे लहसुन के बारे मे निघन्टु यानी AYURVEDIC  MATERIA MEDICA    मे हरित्क्यादि वर्ग मे वरणन किया गया है /

लहसुन के गुणो के बारे मे आयुर्वेद कहता है कि लहसुन पुष्टिकारक  और वीर्य वर्धक और हड्डियो के टूटने के स्थान को जोड़ने बाल और वात तथा कफ को नष्ट करता है / मेधा के लिये हितकार, नेत्रो के लिये हितकर , समपूर्ण शरीर को पुष्ट करने वाला, हृदय रोग, श्वास, जीर्ण ज्वर, पसली का दर्द, , गुल्म ,अरुचि, खान्सी , सूजन, बवासीर, कुष्ज्ठ, मन्दाग्नि, आन्तो के कीद़्ए , स्वास को दूर क्रता है /

लहसुन के बारे मे जो अवगुण है उसके बारे मे आयुर्वेद बताता है कि यह गरम प्रभाव वाला है , भारी है यानी पचने मे ह्लका नही है , पित्त-रुधिर को बढानेवाला यानी खून की गरमी को बढाता है / गर्भ वती स्त्री को इसका सेवन नही करना चाहिये /

भोजन के तौर पर  लहसुन को  प्रयोग करने के लिये हमेशा तेल मे भूनकर और पकाकर ही खाने के लिये विधान है / इसे कच्चा खाने के लिये निषेध किया गया है / यानी लहसुन को कच्चा खाने के लिये मना किया गया है /

आयुर्वेदिक दवाओ के बनाने के लिये लहसुन  के   उपयोग के लिये  लहसुन के शोधन का विधान है /  शोधन विधान इसलिये किये जाते है ताकि लहसुन के खराब प्रभाव को नष्ट किया जा सके या कहराब प्रभाव को अधिक से अधिक तम  स्तर तक   निष्क्रिय किया जा सके  /    औषधियो को बनाने हेतु  लहसुन का शोधन करने के लिये  या शुध्ध करने के लिये निम्न प्रक्रियाये अपनायी जाती है /

  • लहसुन को बीच से चीर्कर या फाड़्कर दो भागो मे बानटते है औउर इसके बीच की कड़ी जड़ को या बीच के कडे लम्बाई  नुमा जड़ जैसे   हिस्से को बाहर निकाल देते है / आयुर्वेद के मनीषियो का कहना है और मानना है कि लहसुन का यह हिस्सा औषधि के उपयोग के लिये नही है /
  • लहसुन के उपरोक्त तरीके से बीच के हिस्से को हटाकर एकत्र किये गये अन्गो को खट्टे मठ्ठे मे २४ घटे या एक दिन-रात भिगोकर रख देते है और बाद मे यही द्रव्य साफ पानी से धोकर और छाया मे पानी के सूखने तक हलकी नमी रहते हुये दवाओ मे प्रयोग करते है /

इस तरह से लहसुन को शुध्ध करके  बनायी जाने वाली आयुर्वेदिक दवाये हर तरह से शुध्ध और शरीर के इलाज के लिये सुरक्षित होती है /

आधुनिक फारमाकोलाजी के वैग्यानिको द्वारा लहसुन पर किये गये अध्ध्यन मे यही सब बाते और तथ्य  प्रायोगिक तौर पर साक्ष्य आधारित स्थालित की गयी है /

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उप्रोक्त पुस्तको मे दिये गये विवरण को समझने के बाद यह स्पष्ट है कि लहसुन के बारे मे आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान के अध्ध्य्यन मे वही सब EVIDENCE BASE  करके बताया गया है जो आयुर्वेद के निघ्न्टुओ मे हजारो साल पहले बता दिया गया था /

इस तरह से किये गये अध्ध्य्यन मे जिन  GARLIC anomalies  के बारे मे बताया गया है वे अशुध्ध अवस्था   मे लहसुन के उपयोग को करके प्राप्त आन्कडे़ है / अगर लहसुन को शुध्ध करके और तब उसके बाद अध्ध्य्यन किया जाता तो वैग्यानिको को वही आनकड़े प्राप्त होते  जो आयुर्वेद के निघन्टुओ मे मिलते है /

आयुर्वेद कहता है कि लहसुन का उपयोग निम्न तरह से श्ध्ध करके किया जाना चाअहिये /

  1. लहसुन को तेल मे भून्कर खाना चाहिये
  2. लहसुन को मठ्ठे मे शोधन करके सभी औषधीय कारयो मे  प्तयोग करना चाहिये

लहसुन के दो टुकड़े कर ले और इस्के बीच की जड़ या कड़े हिस्से को निकाल दे और इसे .तेल के साथ खाना चाहिये

ऊपर बताये गये तरीके से लहसुन खाने से लहसुन कभी नुकसान नही करता बल्कि अमृत की तरह फायदा करता है /

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KAPHA KETU RAS ; A VALUABLE REMEDY FOR KAPHA DOSHA DOMINENT PHYSICAL DISORDERS ;EVALUATED BY AYURVEDA CHEMICAL CHEMISTRY TEST ; कफ केतु रस ; आयुर्वेद की एक महत्वपूर्ण कफ दोष के निवारण के लिये औषधि का आयुर्वेद केमिस्ट्री आधारित परीक्षण


KAPHA KETU RAS is an AYURVEDIC remedy for treatment of  kapha dosha ralated physical problems  , as it is established by the Ayurvedicians.

In classical Ayurveda Formularea KAF KETU RAS  is used in PHLEGM caused FEVER, Mucolytic COUGH, Mucolytic Asthamatic condition and like syndromes, and mucous dominent COLD and Nasal discharge. KAPHA DOSHA and KPHA Dosha Bhed dominent physcial problems of all kinds  including internal Throat and Head and Skull related almost anomalies are covered and well treated by the Ayurvedic remedy.

This remedy is widely used in all kinds of KAPHA DOSHA AND DOSHA BHED AND KAPHA DOSHA DOMINENT SAPATA DHATUS  ailments in toto.

In our research center at Kanak  Research Center, KANPUR we have developed technology based on the Chemical Chemistry mainly derived from Ayurveda and Homoeopathy  sources, are used in the development of the  test since many years. We  have developed a very sensitive instrument for reading of the liquid material for evaluation.

The test is performed in view of Ayurveda Fundamental to correlate the hidden  curative properties of Ayurveda Drugs for its uses as is established by the Olden practitioners of Ayurveda since thousands of years.

Below photo shows the pills of KAPHA KETU RAS are kept in petry dish and a filtered solution specially is kept in glass container small flask, after dissolving in solvent and then filtered.

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Below is specially developed multi use meter very sensitive in nature , is developped at our research center for different uses  for tests and examinations of the liquid material in question.

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Below is the test report of the KAPHA KETU RAS  , which is done on 20//12//2014.

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Conclusion of test ;

Ayuurvedic fundamentals ;

  •  KAPHA   is highest in reading confirms that the remedy is very useful in kapha dosha
  • KAPAHA BHED  ; among the five kinds of Kapha Bhed [1] SNEHAN is the first [2] RASAN is the second [3] AVALAMABAN  is the third [ 4] KLEDAN is the Fourth [5] SHLESHMAN  is the fifth one in the line of Highest to Lower evaluation
  • SAPTA DHATU ;  [1] SHUKRA is the Highest and in first rank [2] MANS is in second [3] MAJJA is in third [4] ASTHI is in fourth [5] RAS is in Fifth position [6] RAKTA is in Sixth position [7] MED is in seventh position.
  • PITTA is in middle position
  • VATA is in Lowest stage

On the discussed above grounds the remedy can be used in the following disease and anomalies ;

  1. KAPHA DOSHA  mainly
  2. KAPHA – VATA DOSHA  mixture of two doshas
  3. KAPHA-PITTA- VATA TRIDOSHA  anomalies
  4. KAPAHA-BHEDA estimation ; [1] SNEHAN KAPHA-BHED  is highest that means it nourishes all INDRIYA [Senses and Sensory organs] by supplying oleation. [2] RASAN KAPHA-BHED in second place. Ayurveda mentions that this Kapha bhed is existed  in Tongue and Oral and Mouth Cavity. All anomalies related to these organs are covered by this Kapha Bheda, This Kapha Bheda is also covers Taste and all six food taste senses. [3] AVALAMBAN KAPHA -BHEDA  is the third one and  is support the HEART and its allied Organs and keeps the organs in safe condition. [4] KLEDAN KAPHA-BHED  is existed in Stomach and helps in making CHYME of the food and CHYME synthesis inside small intestines to support metabolism of different parts of food like Carbohudratesand Fat and Proteine and Minerals and Vitamins and water[5] SHLESHMAN KAPHA-BHED is lowest. This Kapha Bhed is existed in the joints of Bones of all nature, in body whatever they may be. This bhed provides lubrication in-between joints to protect them from friction.
  5. Regarding SAPTA DHATU  ; [1] SHUKRA Dhatu is prominent and is of  highest level. [2] MANS DHATU  is in second grade. [3] MAJJA DHATU is on third garde. [4] ASTHI is in Fourth grade [5] RAS Dhatu is on Fifth grade [6] RAKTA DHATU is on sixth place and [7] MED DHATU is in last [7th place].

If we translate the above data in treatment strategy , we shall find that it is a very valuable remedy in many disease conditions and their syndromes, like ASTHMA. all E.N.T. and ORAL  PROBLEMS and URDHVA JATRU ROGA [ disorders above base of  neck up to complete Head and in side Brain ]   mainly and partly as discussed above in cluster.

According to this analysis  KAPHA KETU RAS  is useful in the following conditions in main ;

  • ENT Ophthalmic disorders
  • Oral and Dental  and Mouth disorders
  • Internal Throat including Pharyngitis and  Laryngitis and Tracheal anomalies
  • Internal Brain pathophysiology
  • Cervical spine anomalies
  • Facial and Skull and Cervical neuro-musculo-skeletal anomalies

Subsequently the remedy can be used in the following conditions with the mixture of main remedy ;

  • Cardiac Problems
  • Digestive problems
  • Blood anomalies
  • Feverish conditions
  • Rheumatism and Joints anomalies
  • Other problems mentioned above represented to KAPHA BHEDA  and SAPTA DHATU respectively.

These are the suggestive uses of this AYURVEDIC REMEDY , which seems to be evaluated from Clinical uses.

However I have used this remedy in single way and not mixes with other remedy mostly in URDHVA JATRU ROGA  successfully. I prescribe three pills of KAPHA KETU RAS in morning and in evening with lukwarm water.

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FILARIA ; AYURVEDA BLOOD TEST BASED AYURVEDA TREATMENT CURED FILARIA SYNDROMES ; फाइलेरिया के रोगी का आय्रुवेदिक रक्त परीक्षण आधारित आयुर्वेद चिकित्सा द्वारा सभी रोग लक्षणो का शमन


Filaria is a parasitic disease condition, which is already established.

The nature of parasitic infection is similar to Malarial fever but in case of Malaria , parasites are deposited and makes their colony inside the LIVER while in case of FILARIA parasites are deposited inside Spleen and make their colony inside the Spleen.

In both the conditions TOXEAMIA is prominent and as a result creates High level Fever with shivering and other refelective syndromes. In both the fever this a common symptom.

But in FILARIA another crucial symptoms arises and they are swelling in LOWER LIMB or swelling in Scrotum with the burning sensation and redness of skin with thick layer.

These manifestations are common and is present in every patient.

A Boy aged 14 yrs suffered from FILERAL infection last month in last week of November 2014. The boy belongs to FATEHPUR district  rural area Village, 65 kilometers away from Kanpur Shahar.

His parents treated with Allopathic remedies but boy refused to take the remedies for their adverse reaction which causes patient uncomfortable. The problem HIGH GRADE FEVER and other genital organs swelling and skin anomalies etc was aggravating day by day without any relief and this was a matter of anxiety for parents.

Parents consulted me for the problem pt have. In this situation I was curious to know what blood changes takes place and I decided to examine patient blood in AYURVEDA LINE.

His Blood was examined and the following data is presented below;

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The above data shows that VATA DOSHA  is High  and KPHA DOSHA  is also  high  than the normal limit. This established that probelm of patient is VATAJ KAPHAJ  mixture of Dosha of Ayurveda  principles.

The SAPTA DHATU  clears the picture and nature of complaints pt have. RAS Dhatu is within normal limit but RAKTA DHATU and MANS DHATU and MED DHATU and SHUKRA DHATU are higher than the normal limit.

MAJJA DHATU is higher than the normal limit.

The Diagnosis of the patient problem is clear that RAKTA anomalies are present and subsequently produces patho-physiology  to synthesis towards the further DHATUS.

filaria 001.The Chemical Chemistry according to Ayurveda way shows cumulatively that PHOSPHATES Total is low and Pottassium is low and Ammonia and Uric Acid is lower  than the normal limit.

Presence of the Blood anomalies show that Inflammatory condition is present in body and is in early stage.

It is observed that in chronic disease conditions Blood Data became high or low parrelal to presence of the level of inflammatory condition.

The Blood test was done on 12 December 2014 and on the findings of these data AYURVEDA REMEDIES were prescribed accordingly. Anti-pyeretic and anti-inflammatory and Blood purifiers and other AYURVEDIC REMEDIES  were prescribed for a week.

After seven days medications the patient was examined again. He have almost got relieved in all symptoms and syndromes of FILARIA. He was advised to take regular treatment for 40 days for complete recovery of Normal health.

Prescribing of Ayurveda remedies on the line of Blood test is a new diagnostics invention in Ayurveda. There is no any earlier evidence before the invention of this method , when on the actual Blood test like this were used for remedies prescriptions.

We are using this method at our research center since many years with fruitful results with correlating to ETG AyurvedaScan findings.

Now we are exploring  the capability of diagnosing body disorders by AYURVEDA BASED  BLOOD TEST. which could be of use in Ayurveda general practice.

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CERVICAL SPONDYLITIS & SYNDROMES ; CURED / RELIEVED BY AYURVEDA TREATMENT ; सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस बीमारी का आयुर्वेद चिकित्सा द्वारा पूर्ण आरोग्य / पूर्ण राहत


सर्वाइकल स्पान्डिलाइसिस  रीढ़ की हड्डियो और उसकी बनावट के अन्गो की सम्मिलित बीमारी है / गरदन की    रीढ की हड्डी की गुरियां या मनका या veretebra  की बनावट मे कुदरती तौर पर कुछ फेर बदल हो जाता है या इस फेर बदल के साथ इन अलग अलग छोटी छोटी हड्डियो मे परिवरतन होता है तब इस परिवरतन के कारण जिन्हे pathological  या  pathophysiological  changes  कहते है , के कारण से NEURO-MUSCULO-SKELETAL  य़ा neuro-skeletal – या musculo-skeletal  सम्बन्धित syndromes  या लक्षण या लक्षण समूह पैदा हो जाते है /

लक्षण समूह सभी स्पान्डिलाइटिस के मरीजो मे एक जैसे नही होते है / हर मरीज के लक्षन अलग अलग किस्म के और एक्ल या मिश्रित किस्म के होते है /

यह लक्षण य लक्षण समूह निउम्न तरह के हो सकते है ;

[१] चक्कर आना ; कुछ मरीजो को चक्कर आने की तकलीफ पैदा हो जाती है / ऐसे मरीजो को किसी भी  तरह की शारीरिक position मे चक्कर आने लगते है / बैठकर उठते हुये अथवा सामने की ओर नीचे की तरफ झुकते हुये, सिर के दाये बाये या ऊपर नी\चे घुमाते हुये, लेटने  पर या लेट कर   ऊठने  पर , सोते समय करवट बदलने पर बैठे हुये या कोई काम  करते हुये शरीर को इधर उधर झुकाते हुये , कहने का तात्पर्य यह कि किस position  मे चक्कर आने लगे कुछ बताया नही जा स्कता है /

यह चक्कर की स्तिथि दो तीन सेक्न्ड से लेकर कई कई मिनट अथवा कई कई घन्टे तक बनी रहती है / मरीज को ऐसा लगता है कि धरती हिल रही है अथवा पलन्ग हिल रहा है अथवा वह हवा मे उड़ रहा है अथवा वह लुन्ज पुन्ज जैसी हालत मे पड़ा हुआ है / चक्कर की intensity level का पता नही चलता है /

[२] दर्द होना ; बहुत से रोगियो को दर्द होता है / यह दर्द हलका भी हो सकता है और बहुत तेज किस्म का भी / सिर के एक छोटे से   हिस्से मे दर्द हो सकता है और यह दर्द पूरे शरीर मे भी फैल स्कता है /

बहुत से रोगियो को गरदन के पीछे किसी भी स्थान मे एक छोटे से हिस्से मे दर्द की अनुभूति होती है और वही तक सीमित होकर रह जाती है और इससे अधिक नही बढती है /

कुछ रोगियो को गरदन के एक तरफ के हिस्से मे दर्द होता है और इस दर्द का फैलाव गरदन के दाहिब्नी तरफ    के हिस्से की मान्सपेशियो तक जाता है / दर्द के साथ गरदन की माश्पेशियो मे अकड़न और जकड़्न हो जाती है / इससे गरदन का movement  बहुत तकलीफ के साथ होता है /

कुछ रोगियो को दरद गरदन की तरख या गरदन से लेकर सीने की मान्श्पेशियो तथा CHEST MUSCLES  तक होने लगता है / किसी किसी को दर्द chest  की तरफ न होकर पीठ की तरफ होता है और पीठ की मान्शपेशियो मे दरद और  अकड़न तथा जकड़न एकल या मिश्रित रूप मे हो जाती है /  ऐसा दर्द कभी कभी गरदन से लेकर पूरी पीठ मे होने लगता है /

किसी किसी कि गरदन मे दर्द न होकर दर्द कमर मे होने लगता है / इसे metastatic pain  कहते है या remote pain  कहते है / इस तरह का LUMBER REGION pain  कभी कभी सरवाइकल के दर्द के कारण होने लगता है /

किसी किसी को दर्द नीचे की ओर न जाकर सिर के ऊपरी हिस्से अथवा नाक की जड़ यानी साइनस की तरफ होने लगता है / यह दर्द ऐसा लगता है जैसे सिर दर्द हो गया है /

किसी किसी रोगी को चेहरे की मान्श्पेशियो मे दर्द होप्ने लगता है / यह दर्द neuralgic pain  की तरह का होने लगता है /

३- मान्स पेशियो मे  अकड़न और जकड़न   किसी किसी रोगी को सिर  और गर्दन घुमाने मे माशपेशियो की अकड़न और जकड़न होती है जिसके कारण गरदन के  movement   मे बाधा पैदा होती है /  यह अकड़न और जकड़न पूरी पीठ और सीने मे जब पहुच जाती है तो सारा शरीर movement less  होने लगता है /

४- सुन्न पन होना  sensation of NUMBNESS  ; बहुत से रोगियो के हाथ की उन्गलिया और ऊपर के हाथ सुन्न होने लगते है / एक य सभी उनगलिया इससे प्रभावित होती है /

इस तरह का सुन्न पना सिर और गरदन मे भी होता है / इन जगहो पर सुई चुभोने से भी कुछ दर्द नही  होता है  /

५- अजीब तरह के sensation ; बहुत से मरीजो मे अजीब तरह के अनुभूतिया होती है / इन अनुभूतियो मे किसी किसी को लगता है कि उसके सिर पर बर्फ जमा हो गयी है / किसी को महसूस होता है कि उसके सिर पर टोपी लगी ह्यी है / किसी को लगता है कि उसका सिर किसी खान्चे मे रख कर द्बा या जा रहा है /

६- सम्मिलित तकलीपे MIXED SENSATIONS ; कुछ मरीज ऐसे होते है जिनको एक तरह की अनुभूति नही होती बल्कि कई तरह के sensations  मालूम होते है / किसी किसी रोगी को दर्द क्ले साथ अकड़न और एठन होती है / किसी को एइठन के साथ सिर पर भारी बोझ्ह लादने जैसा महसूस होता है / किसी किसी को दर्द के साथ सुन्न पन होने की शिकायत होती है /

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[ X-RAY Plate showing the Cervical spine condition of

a patient with deposition of extra calcium and

enlarged shape of vertebral bone with irregular gaps] 

.ऊपर बताये गये लक्षणो के अलावा भी अन्य और बहुत से लक्षण सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस बीमारी मे होते है जिन्हे यहा विस्तार से नही बताया गया है /

फिर भी लक्षण होना एक बात है और निदान ग्यान दूसरी बात है / CERVICAL SPONDYLITIS की बीमारी का निदान X-RAY द्वारा किया जा स्कता है / इसके अलावा CT Scan SCAN  द्वारा किया जा स्कता है /

आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन द्वारा CERVICAL SPONDYLITIS   का निदान किया जाता है / इसके अलावा हमारे यहा विक्सित किये गये कुछ टेस्ट द्वारा पताकिया जा स्कता है कि गरदन की माश्पेशिया और स्पाइन का कितना स्ट्रेस किस साइड का किस वैल्यू का है , इस तरह से नाप करके यह पता किया जा स्कता है कि किस तरफ की मान्श पेशियो कितनी कमजोर या सामन्य है /OLYMPUS DIGITAL CAMERA.सर्वाइकल .स्पान्डिलाइटिस होने का कारण क्या होता है ?

यह बीमारी गरदन के  vertebral column  और इसकी बनावट से समबन्धित होती है / बनावट से मतलब हड्डिया और टेन्डन और कार्टीलेज और मान्सपेशियां और खून के दौरान के लिये नस और नाडियां आदि आदि  सम्मिलित अन्ग जिनसे मिलकर सर्वाइकल रीजन की बनावत होती है /

मानव शरीर कुदरत का एक बहुत बड़ा अजूबा है जिसे समझने मे समय ही समय लगेगा और उसके बाद भी घूम फिर कर यह पहेली ही बन कर रह जायेगा / इसे कोई समझना चाहेगा भी तो यह सबकी समझ से बाहर होगा और इसी तरह समझने के प्रयास होते रहेन्गे क्योन्कि ऐसा मानव का स्वभाव है / जब हम और हमारे वैग्यानिक यही नही समझ पाये है कि इन्सान चार पाये जैसे जानवर से दो पाये का इन्सान कैसे बना है  जो कुदरत का सबसे बड़ा करिश्मा हुआ है जिनसे इन्सान ने तरक्की की राहे खोजी /

सोचिये अगर इन्सान के दो हाथ न होते तो वह क्या इतनी बड़ी तरक्की दुनिया मे कर सकता था  ? जब चौपाये से दोपाये मे इन्सान बना तो उसके दोनो हाथ खाली थे और इन्ही खाली हाथो से उसने तरक्की के रास्ते खोले /

बहर्हाल कहने का मतलब यह कि कुदरत ने जिस जिस्म को बनाया है उसमे वही तत्व शामिल है जो प्रकृति मे पाये जाते है /

स्पान्डिलाइटिस होने  के कारण मे सबसे पहले गरदन की बनावट मे inflammatory condition  का पैदा होना मुख्य है / Inflammation  होना एक तरह कॊ pathophysiological  और pathological  प्रोब्लेम है /

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ई०टी०जी० आयुर्वेदस्कैन द्वारा सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस का पता कफ स्थान की रिकार्ड की गयी  ट्रेसिन्ग  के अध्ध्य्यन करने के बाद निदान कर लिया जाता है कि रोगी को किस स्तर की patho=physiology  और किस तरह के लेवल की pathology  उपस्तिथि    है /

नीचे कुछ प्रकार के स्पान्डिलाइटिस के रोगियो के निदान ग्यानात्मक कम्प्य़ूटराइज़्ड   ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और ट्रीड-मशीन आयुर्वेदास्कैन के specimen दिये गये है /

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आयुर्वेद के परीक्षण का आधार आयुर्वेद के सिध्धान्त और आयुर्वेद के निदान ग्यान और आयुर्वेद के चिकित्सा निर्देश तथा आयुर्वेद कि पथ्य वयवस्था और आयुर्वेदोक्त रहन सहन और जीवन शैली के मूल को लेकर डेवलप की गयी है / इस आधुनिक तकनीक ही आयुर्वेद के सान्गोपान्ग आधार को लेकर विकसित की जा रही है / इसी कारण से जब सरवाइकल स्पान्डिलाइटिस की तकलीप का निदान होता है तो यह भी पता चल जाता है कि [१] प्रकृति क्या है ? [२] जन्म के समय दोष किस स्तर के मौजूद रहे है ? [३] जिस समय रोगी का परीक्शण किया गया है उस समय शरीर के दोषो  की क्या स्तिथि रही है [४] सप्त धातुओ का क्या स्तर रहा है ? [५]  .वात दोष से सप्त धातु किस प्रकार प्रभावित है और पित्त दोष से कितना प्रभावित है और कफ दोष से सप्त धातु का क्या प्रभाव है ? [६] प्रतयेक दोष के पान्च पान्च दोष भेद का कया आनकलन रहा है ? यानी १५ दोष भेद किस स्तर के है [७] तीन प्रकार के मल का क्या स्तर है ? [७] चरकोक्त दोष विकृति का क्या समीकरण बना है ? [८] श्रोतो -दुष्टि किस स्तर की है और कौन कौन से CHANNEL  anomalies  की स्तिथि पैदा कर रहे है ? आदि आदि बहुत से आयुर्वेद के सिध्धान्त का आंकलन हो जाता है ?

इन सभी आन्कलनो के साथ साथ .शरीर के अन्दर व्याप्त लगभग सभी प्रकार की बीमारियो की उपस्तिथि का पता चल जाता है / यह इस्लिये जरूरी है क्योन्कि जब आयुर्वेदिक दवाओ को मरीज की चिकित्सा के लिये उपयोग करते है तो कम से अकम और अधिक से अधिक प्रभाव करने वाली दवाओ का चुनाव करना बहुत आसान हो जाता है जिससे रोगि के रोग  उन्मूलन मे तेजी से सहयता मिलती है और इलाज अचूक और सटीक होता है /

इसके अलावा इअसे यह सहायता मिलती है कि मरीज को किस तरह क प्थ्य पालन और जीवन शैली को अपनाना चाहिये ताकि उसे शीघ्र आराम मिल सके /

स्पान्डिलाइतीस के उपरोक्त रिकार्ड किये गये ट्रेसेस से पता चल जाता है कि चरवाइकल स्थान की स्तिथि किस तरह की है / स्पान्डिलाइटिस की तकलीफ किस स्तर की है और फिर उसी स्तर से द्वओ का चुनाव करते है /

ABC 001मेरे  observation  मे कुछ बाते आयी है जिन्हे मै आप सबसे  share  करना चाहता हू /

[अ] ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन मे जब कफ स्थान से रिकार्ड किये गये ट्रेस severe level  के  मिलते है  तो  ऐसे मरीजो को चक्कर और गरदन से लेकर हाथ की उनगलियो के सुन्न होने की शिकायत होती है / अधिकतर ऐसे मरीजो के x-ray findings मे पहला दूसरा और तीसरा cervical vetebra  की anomalies present  होती है /

[ब] ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन मे Moderate level के ट्रेस मिलते है तो इसमे रोगी की गरदन मे दर्द और सिर मे दर्द और माथे मे दर्जै और यह  दर्द  कभी  कभी नाक के ऊपरी हिस्से मे चला जाता है इस तरह की migrated   तकलीफे पैदा हो जाती है /  X-ray findings  मे ऐसे रोगियो के तीसरा या चौथा या पान्चवां vertebra  मे  anomalies present होती है /

[स] ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन मे MILD level  के ट्रेस मिलते है तो इसमे रोगियो के गरदन से लेकर पीठ तक और ्कन्धे से लेकर सामने रिब-केज की मान्शपेशियो तक दर्द होता है जो movement या आराम करने की स्तिथि मे भी कम नही होता है  बल्कि बढता है / X-ray findings  मे सर्वाइकल स्पाइन का पान्चवां और छटा और सातवां वर्टिब्रा की बनावट मे परिवरत्न होने के कारण ऐसा होता है /

यह एक तथ्य है कि मानव शरीर का सबसे ज्यादा movement  करने वाला अन्ग मानव की गरदन और सिर है / यही सबसे ज्यादा मानव उपयोग मे लाता है /

इस तकलीफ के इलाज के लिये आधुनिक चिकित्सा विग्यान की औषधिया और फीजियोथेरापी का सहारा लिया जा स्कता है /

इसके अलावा आयुर्वेद की चिकित्सा और पन्चकर्म द्वारा इस बीमारी का इलाज किया जाता है /

होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा मे भी इसका इलाज है /

योग और प्राकृतिक चिकित्सा मे भी इसका इलाज मौजूद है /

सर्वाइकल स्पान्डिलाइटिस के मरीजो का इलाज करने के बाद अपने प्राप्त अनुभव से  एक बात मै विशेष तौर पर यहां कहना चाहून्गा   कि यदि स्रवाइकल के रोगी का सम्मिलित चिकित्सा विधियो से यानी COMBINATION THERAPIES   [काम्बीनेशन थेरेपीज से मतलब एलोपैथी और आयुर्वेद और होम्योपैथी और योग और प्राकृतिक चिकित्सा की औषधियो और साधनो का सम्मिलित उपयोग करना] से अगर इलाज किया जाता है तो इसमे पूर्ण अरोग्य अवश्य होता है और जीवन शैली को नियमित करने से यह तकलीफ बिल्कुल ठीक होती है /

इस तकलीफ का होने का कारण आयुर्वेद के हिसाब से कफ दोष की मुख्यतया प्रधानता है जिसमे वात दोष का मिल जाने से उप्रोक्त बतायी गयी बाते पैदा होती है /  कफ और वात की चिकित्सा करने से रोग शमन होता है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज से CERVICAL SPONDYLITIS  की बीमारी  अवश्य ठीक होती है /

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FIBROSIS FAT GLANDS ; BELOW SKIN DERMIS GLANDS IN WHOLE BODY IS CURABLE ON THE LINE OF THE FINDINGS OF E.T.G. AYURVEDASCAN EXAMINATIONS BASES AYURVEDA TREATMENT ; शरीर की चमड़ी के नीचे पैदा हो रही गान्ठो का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन जान्च आधारित आयुर्वेदिक दवाओं द्वारा रोग-मुक्त उपचार


बहुत से लोगो को शरीर की चमड़ी के नीचे मुलायन चर्बी – युक्त गान्ठे हो जाती है / इन्हे कई नामो से पुकारते है , कोई इसे  फाइब्रोसिस FIBROSIS  कहता है , कोई इसे FAT GLANDS   कहता है , कोई वात रोग की गुमड़ी कहता है , कोई कुछ और कोई कुछ /

So many  human beings suffers from the Glands called FIBROSIS by some one in general language , which are soft in nature and persists below the dermal layer of skin. Some say “FAT GLANDS” , some says deposition of FAT and NOXIOUS waste product  accumulation and so on.

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ऊपर के दिये गये चित्र मे रोगी की गान्ठो को देखा जा सकता है / इस रोगी के सारे शरीर मे इसी तरह की गान्ठे भरी पड़ी हुयी है / कोई कोई तो इतनी बड़ी है जैसे कि कोई नीम्बू का आकार प्रकार हो / मेरे पास एक परिवार ऐसे भी  देखने मे   आया है जिनके दादा परदादा से लेकर  नाती पोते तक सबको ऐसी ही गान्ठे शरीर मे रही है और अभी भी next generation  मे देखने मे आया है कि उनके यहां भी यह तकलीफ हो रही है /

Above photograph shows the GLANDULAR PRESENCE , the patient have a large number of glands in his whole body and every part of body is full of smaall and large glands both, some of them are of small LIME SIZE glands. I know one family whio is having this type of complaints right from Great Grand Father to the great grandson. All the males are suffering with this complaints but non of female I have seen in this family, who is suffering with this complaints.

लेकिन एक विशेष बात यह देखने मे आयी है कि यह गान्ठे केवल MALE GENDER  मे ही देखी गयी है / अभी तक जितने भी मरीज आये है उनमे लगभग 99 % MALE  और केवल 2% FEMALES  रोगी इस तरह की गान्ठ वाले देखे गये है /

But one thing I have noticed that among this type of complaints MALES are affected 98 % and FEMA:LES 2%, this came in my observation.

इस रोग का कोई इलाज नहि है ऐसा बहुत से लोग कहते है / यह गलत धारणा है जो लोगो के मन मे बैठ गी है लेकिन इस बीमारी का आयुर्वेद मे इलाज है और बहुत सटीक और बहुत अचूक इलाज मौजूद है /

It is presumed that this disease condition have no treatment as is propagated by the medical fraternity. I am afraid here to say that the presumption about this disease condition is now proved wrong and I must say that this can be cured /relieved by the AYURVEDIC TREATMENT bases on the line of the findings of E.T.G. AyurvedaScan and its supplementary tests and examinations. Thus prescribed  present Ayurvedic  treatment is perfect and fool-proof and have curative effects.

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ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और इसके तत्सम्बन्धित जान्च और परीक्षण की विधियो पर आधारित आयुर्वेद दवाओ द्वारा  इलाज करने से यह बीमारी अवश्य ठीक हो जाती है /

This disease condition is sure cured by the Ayurvedic treatment as is said before on the line of the findings of ETGAS.

फाइब्रोसिस के  एक रोगी का कम्प्यूटराइज्ड  ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और ट्रीड-मशीन ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के द्वारा परीक्षण करने पर पता चला कि उसे किस तरह के शारीरिक patho-physiology  और pathology  का परिवर्तन होकर यह तकलीफ पैदा हो रही है /

A FIBROSIS Glands suffered  patient is examined recently at our research center and the trace record shows the anomalies present in his body both patho-physiological and pathological basis grounds.

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रोगी के ऊपर बताये गये ट्रेस रिकार्ड शरीर के mapping के अनुसार रिकार्ड किये गये है / ये रिकार्ड कम्प्यूटेराइज्ड ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और ट्रीड मशीन / एक्सर्साइजीन्ग ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के द्वारा रिकार्ड किये गये है /

इस रिकार्ड को देखने से पता चलता है कि त्वचा के नीचे से आने वाले विद्युतीय सिगनल बहुत देर से आ रहे है और इनमे एकरूपता नही है / त्वचा के नीचे से आने वाले late signal का यही अर्थ है कि त्वचा का काम सामान्य नही है और इसमे विकार उपस्तिथि है / यह विकार क्यो पैदा हो रहे है और कैसे पैदा हो रहे है तथा त्वचा के नीचे गान्ठे क्यो बन रही है ?? इसके बारे मे जब सारे शरीर के परीक्षण के बाद प्राप्त डाटा से पता चला कि इस रोगी के शरीर के आन्तरैक अन्गो के कार्य असामान्य है और इसके refelection के तौर पर गान्ठे बन रही है /

The above records are taken after selected mapping of the body.These records are taken by Computerised ETG AyurvedaScan machine and Tread machine / exercising ETG AyurvedaScan machine,

Observing these records , it is established that signals are cropping very late and there is no equality. Below skin signals , if comes late , it is due to skin natural functions anomalies. Why this is happening and why signals are comming late and why Glands are generating beneath the skin , this is established after the data collection from report. The reprot indicates which organs are not functioning well or in deranged conditions. As a refelection of these organs anomalies , problem is arising with the patient.

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ऊपर के चित्र मे चमड़ी का वरणन किया गया है / तीर वाले बताये गये निशान का स्थान चमड़ी के सबसे अन्तिम हिस्से के एक भाग को बता रहा है / सामान्यतया चमड़ी मे चर्बी इसी स्थान पर जमा होती है और यह आवश्कतानुसार चमड़ी की कई पर्तो को impregnete करती है /

The above figure is showing the deposition of FAT Molecules beneath the Skin. The Fat deposite is used when in need.

नीचे के चित्र के त्वचा के नीचे के इन्गित किये गये हरे रन्ग के हिस्से को हाइपर डर्मिस कहते है और इसे चर्बी से युक्त भाग बताय गया है /

Below given Green color part in Figure is rich in FAT and is called HYPODERMIS part. Most of the metabolised Fat molecules are collected here.

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नीचे के चित्र मे बतया गया है कि मान्शपेशियो के तन्तु के साथ रक्त वाहिनियां लिम्फैटिक सिस्टम की भी सहायता लेकर किस प्रकार ्चर्बी को त्वचा के नीचे लाती है /

Muscle Fibers and Blood Vessels through Lymphatic system helps in deposition of Fat.

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नीचे के चित्र मे बताया गया है कि त्वचा के नीचे के सबसे गहरी पर्त मे किस जगह चर्बी जमा हो जाती है ?

Deepest layer of Skin is formed mainly of whitish Fat cells. Pathophysiology of Fat cells causes formation of Glands at deepest layer of Skin.

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वास्तविकता यह है कि त्वचा के नीचे होने वाली गान्ठ अक तरह की चयापचय से समबन्धित बीमारी है जो चर्बी की गान्ठ है और इसीलिये शरीर के सभी हिस्से इससे ग्रसित होते है / यह एक तरह की शारीरिक बीमारी है जो मानव शरीर के अन्दरूनी अन्गो की सही काम न करने की वजह से पैदा होती है /

The fact is that this Adipose Tissue Glands are the refelection of the metabolic disorders and fat chain chemistry anomalies. This is a physical disease , which is due to pathophysiology of the human Homeostatis system and its consequences.

बहुत से लोग इन गाम्ठो को देखकर डरते है कि कही यह कैन्सर की गान्ठे तो नही है ? अक्सर लोग इस तरह की गान्ठे देखकर भय्भीत हो जाते है और अनावश्य रूप से डाक्टरो को परेशान करते है / मै  यहां हलका   जोर देकर नही  बल्कि अपनी बात  बहुत  वजन  और बहुत जोर देकर कहता हू कि यह गान्ठे किसी भी तरह से कैन्सर की गान्ठ नही होती है और इससे कैन्सर हो जाने का भय नही पालना चाहिये /

आयुर्वेद मे इसक इलाज मौजूद है / कारण और उसका  निवारण करने से यह बीमारी ठीक हो जाती है / .

So many parient having this complaints, fears for cancerous glands. I will highly voiced that these glands are not Cancerous in any way and should not misguide themselves.

Ayurveda have this condition complete and fool-proof treatment and treating with ayurvedic remedies the disease is cured totally.

आयुर्वेद के सिध्धान्त के अनुसार इस रोगी को निम्न प्रकार के वातादिक दोष का आन्कलन किया गया है /

[१]  दोष ;  पित्त सबसे अधिक ; कफ सबसे कम

[२] दोष भेद ; भ्राजक पित्त भेद,; श्लेष्मन पित्त भेद ; ब्यान वात

[३] सप्त धातु ; रस धातु कम ; रक्त धातु अधिक ; मेद धातु अधिक ; मज्ज धातु अधिक

[४] श्रोतो दुष्टि ; मेदो श्रोतो दुष्टि ; रसश्रोतो दुष्टि

इस तरह से प्राप्त निदान के ग्यान से आयुर्वेद की औषधियो का बहुत सटीक चयन और मरीज को पथ्य परहेज बताने के लिये और क्या भोजन व्यवस्था और जीवन शैली को मरीज के लिये व्यकतिगत तौर पर बताने मे बहुत सहायता मिलती है /

इस तरह से औषधि व्यवस्था और पथ्य-जीवन शैली व्यवस्था से रोगी शीघ्र स्वस्थ्य होते है /

According to Ayurveda Principals, diagnosis of AYURVEDIC PRINCIPALS  have done as followings;

[1] Dosha ; PITTA HIGH  ; Kapha Low

[2] DODHA BHED ; BHRAJAK PITTA BHED ; SHLESHMAN PITTA BHED ; VYAN VAT BHED

[3] SAPTA  DHATU BHED ;  Ras Dhatu less ; Rakta Dhatu High ; Meda dhatu Higher, Majja Dhatu Highest

[4] CHANNEL ANOMALY ; MEDO CHANNEL ANOMALY PRESENT ; RAS CHANNEL ANOMALY PRESENT

Diagnosis of Ayurveda Principals leads a perfect solution of the patient’s problem both in selection of appropriate remedies and appropriet Life style and do and donts.

In this way , Ayurvedic treatment  becomes fool-proof and fast recovery of normal health gains rapidly.

prescription 001 (और ज्यादा…)

EPILEPSY PATIENT’S COMPARATIVE STUDIES OF E.T.G.AYURVEDASCAN FINDINGS FOR ACCURATE DIAGNOSIS OF HOMOSTATIC INTERNAL RELATION TO PROBLEM AND ITS SOLUTIONS ; मिर्गी के मरीज का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित विवेचना और इस बीमारी का निदान और चिकित्सा


EPILEPSY  यानी मिर्गी के रोगी का इलाज आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित करने से मिर्गी के शत प्रतिशत रोगी ठीक होते है /

  EPILEPSY or Seizers is a total curable disease condition , if treated Ayurvedically on the line of E.TG. AyurvedaScan  findings  and its supplementary examinations. Below mentioned Epilepsy case is of a 22 yrs old patient from Himanchal Pradesh, who  is suffering EPILEPTIC features since 10 yrs.and is taking regular Allopathic remedies, but Seizers are still comming in regular features weekly two three times, even after regular intake of anti-epileptical drugs.

His mind and Brain faculties are becomming weak and weaker slowlky and gradually and changes in his behaviour is an extra feature for his parents.

Somebody  who have taken my earlier treatment, has  recommended his parents for my specialise Ayurveda-Ayush Epilepsy  treatment..

His ETG AyurvedaScan and other examinations were done. A short summery of the comparative evaluation of the record traces are given  below.

In Horizontal position . electrical diffusion from recorded regions shows the  intensity of electrical diffussions by Viscera and Body parts and Body systems.. This  record is taken by  a computerised proto-type ETG AyurvedaScan machine.

The second record is taken by the Tread-machine / excercising ETG AyurvedaScan  machine, this shows  the changes in the record done on Verticale position with vigorous motions. Due to gravitation and other physical forces impacts on human body, changes in traces occurs and this helps the perfect diagnosis of Ayurvedci Fundamnetals and physcial diagnosis in four dimensional..

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Below is given the DIAGNOSIS in view of HOMEOSTATIC , this diagnosis shows that which parts are involved while at rest or in resting position.

In Tread machine test the condition is seletively while in agitating or aggressive body function position. Some common or additional diagnostics changes occurs in both situations. This is necessary for treatment and diagnosis and other essential purposes. Four dimensional diagnosis is therefore essential ti give acuratiive treatment to patient.

In continuous ETG recording , almost 120 to 300 minutes are recorded according to the need. Fraction of seconds records shows the anomalies caught in trace records. This is necessary for evaluation of the BRAIN PARTS in view of anantomy and physiology and pathology view points and to secure treatment for these anomalies findings.

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.AYURVEDIC FUNDAMENTAL are evaluated in both the conditions. See how in both conditions Ayurveda principles are changes .

VATA DOSHA is low in both the conditions but PITTA and KAPHA are changes in both REST condition and in EXERCISING conditions. Therefore the nature of DOSHA is changes according to circumstances  ,  which proovies the theory of Ayurveda  VATA that Vayu carries the PITTA and KAPHA with them, because PITTA and KAPHA are lame and cannot move without the help of VATA.

Below is the list which shows the value of VATA which is somehow equal in this case and not very  different but changes in PITTA and KAPHA values are  in the position of REST and PHYSICAL exercise.have a vast differential values These values shows the changes in temeprament of the patient while at rest and while at physical movements.

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Below shows the values of BRAIN PARTS in REST and in MOVEMENT conditions..

The BRAIN part Condition shows the FRONTAL and PAREITAL BRAIN pathophysiology. An extra feature of the test is that OCCIPITAL LOBE is showing high value.

We have obseved that those patient , who have this type of combination , generally suffered from GHOST presence, Devil presence, BHUT present and taliking with the ATMA. On inquiring on this point  to patient, patient accepted that he have this kind of tendency and sees ghost and evil sprits.

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Below picture is showing the functions of the BRAIN and Brain parts..

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Modern medical systems medicine are prepared from the .chemical and the following salts / ingredients are used for the treatment of EPILEPSY.This list is prepared by the experts of WORLD HEALTH ORGANISATION..

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Above WORLD HEALTH ORGANISATION  list shows the Anti-convulsive remedies.

Many Anti-convulsant and Anti-epileptic drugs are stopping Seizers and syndromes , when these are taken regularly. If not taken in a day interval, attacks of epilepsy re-appears. Some of the salts used in treatment are in-effective for those patients, who are taking  ALCOHOL and narcotics regular or other intoxicating materials like cigarettes and hukka and marijuana etc. These materials have an anti effects on alkeloids of anti-epileptic / anti-convulsive remedies.

those victims, who are habitual to use these narcotic materials will automatically  deactivate the remedial effects and as a result caught SEIZER. We cannot say about the effects of these remedies but what we observed is narrated here.

Below is given details of an anti-epileptic remedy taken among the group, which is widely used worldwide.to control the seizers.

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Contraindications and adverse effects and precautions and other details are given in this page, which is taken from book ESSENTIAL REMEDIES recommended by WORLD HEALTH ORGANISATION. 

There are also several reasons, which are responsible for creating disorders, as we have mentioned earlier , while analyzing the case in view of E.T.G. AyurvedaScan and its supplementary findings , which diagnose the problem in four dimwentional and according to the rules of Ayurveda.

By this way, the problem solution is thought over and multi-functional Ayurveda remedies are chosen to meat    and match the syndromes of patient and ETGAS findings. Thus HOMEOSTATIC treatment  for EPILEPSY is selected on the line of Ayurveda and in this way the total 100% cure is possible.

The problem with these remedies is that that these remedies are capable to stop the convulsion symptoms and not the anomalies of BRAIN pathophysiology.As a result the channel of triggering the disease is not treated and so the root problem is remain in the system which causes the spasmodic effects and is produces as convulsions.

Comparatively Ayurveda and Ayush therapies have a lot of remedies which treated the root problem of the disorders patient have.

Latest Ayurveda Hi-technology ETG AyurvedaScan bases AYURVEDA and AYUSH treatment , heals patient in FOUR direction and dimensins , which are discussed earlier many times.

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