DEV ANAND AND SURRAIYA INDIAN SUPER FILM STAR’S LOVE AFFAIRS MENTAL ANALYSIS ; ंमश्हूर फिल्म स्टार देवानन्द और सुर्रैया के बीच के हुयी कुछ बातो की मानसिक विवेचनामै


देवानन्द मेरे प्रिय सिने स्टार है / मैने उनकी फिल्मे बचपन से ही देखना शुरु किया था / उनके प्रेम के किस्से मै जवान जहान युवक और युवतियो के वारतालाप को छुप छुप कर सुना करता था / स्कूलिन्ग के दिनो मे मै उन्ही की स्टाइल मे बाल रखता था / उन्ही की स्टाटाइल मै  फिल्मो मे बोले जाने वाले डायलाग बोलने के अन्दाज मे अपने दोस्तो के साथ    उनकी नकल  करके बोला   करता था और उनकी स्टाइल मे ही चलता था / कपडे भी उन्ही की तरह के पहनता था और देबानन्द की तरह की अल्हड़्ता मन मे चौबीस घन्टे भरी रहती थी / लड़्कियो को मै उन्ही के अन्दाज मे ” है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पे आयेगा ” या ” उफ यूम्मा ये आन्खे उफ यूम्मा ये धड़कन” या ” सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था आज भी है और कल भी रहेगा ” जैसे गानो को सुनाकर लड़्कियो ्से फ्लर्ट किया करते थे / उनको देवा नन्द के डायलाग सुनाया करते थे / हीरोइनो मे मुझे श्यामा के अलावा कोई दूसरी हीरोइन अच्छी नही लगी / मै श्यामा की गेट अप और उनकी अदाओ का बहुत और बेहद हद   तक  दीवाना रहा / मुझे श्यामा के अलावा रूपहले   पर्दे की किसी       दूसरी हीरोइन ने प्रभावित नही किया /

इसलिये मै कह सकता हू कि मेरे पूरे जीवन मे देवानन्ड और श्यामा का बहुत प्रभाव पड़ा है / जो आज तक बरकरार है और आगे भी जब तक जिन्दा हू ऐसा क्रेज इन अभिनेताओ के प्रति   बना रहेगा /

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मेरा आज भी चलने का कुछ स्टाइल देवानन्द से मिलता जुलता है / इसी कारण जब मे सड़क पर चलता हू तो लोग मेरे हाथो और चलने के स्टाइल पर कहते है देखो देवानन्द की चाल वाला आ रहा है /

सामने से आ रही लड़्किया और देवानन्द के जमाने की महिलाये मुझे सड़्क पर चलते हुये देखकर हंसने लगती है और किशोर या जवान उम्र की लड़्किया मेरे चलने के स्टाइल को देखकर  देवानन्द की चाल की नकल करने लगती है और वे  अपने दोनो हाथ को आगे की तरफ फेन्क कर क्रास बनाने लगती है और गर्दन  हिलाकर   देवानन्द की तरह नकल करने लगती है और फिर   हन्सने लगती है /

मे यह सब देखकर चिढता न्बही हू बल्कि खुश होता हू और बहुत खुश होता हू कि चलो मेरे चलने के स्टाइल पर अगर इस देश के लोग देवानन्द जैसी महान कलाकार हस्ती को मेरे चलने के बहाने याद करते है तो यह मेरे लिये बहुत फक्र की बात है / मै जिस शहर मे  या कस्बे या गांव मे जाता हू  या किसी जगह  जाता हू  तो यही हाल होता है / मेरे बोलने का तरीका भी कभी कभी लोगो को समझाते समय देवानन्द की डायलाग दिलीवरी की तरह हो जाता है /

मुझे बीते जमाने की हीरोइन श्यामा का बहुत क्रेज था / मैने १० साल की उम्र मे  सबसे पहली फिल्म “नास्तिक” देखी थी / एइ दिल मुझे बता दे तू किस पे आ गया है गाना गाते हुये श्यामा को जब रूपहले पर्गे पर देखा तो मै उनकी श्क्ल सूरत देखकर इतना मन्त्र मुग्ध हो गया कि उअन्के जैसी गेट अप वाली लड़्की और शोख अदाओ वाली लड़्किया मुझे बहुत पसन्द आने लगी /

अचानक एक दिन मुझे कालेज जाते समय एक लड़्की दिखी जिसे देखकर मुझे उसमे श्यामा का अक्स नजर आया / दिन बीतते गये स्कूल आते जाते रास्ते मे उससे बाते होने लगी / उस समय मेरी उम्र १७ साल की थी / मै उससे बेहस प्यार करने लगा और वह भी /  मै इस  समय कछा ११ का छात्र था / गर्मियो की छुट्टि मे मैने उससे वादा किया था कि मै उससे जरूर मिलता रहून्गा / लेकिन उसके बाद वह मुझे कभी भी नही मिली / मैने उसके बारे मे  बहुत पता किया उनके पिअता जी सरकारी सेवा मे थे / उसे ढून्ढने की कोशिश की लेकिन कुछ पता नही चला /

मै फूट फूट कर रोया / मुझे कुछ अच्छा नही  लगता था और मेरी मनो दशा अन्दर से बहुत बरी हो गयी / हर लड़्की दूर से मुझे वही नजर आती थी /

धीरे धीरे समय के साथ थोड़ा मरहम लगा / लेकिन पहला प्यार क्या होता है ? यह धीरे धीरे समझ मे आने लगा /  मन मे जब तृप्ति का भाव नही होता तो हमेशा एक कसक बनी रहती है कि जिस चीज को पाना चाहता था वह नही मिला/ जिसे सबसे ज्यादा दुनिया मे चाहता था और न जाने कितने सपने बुने थे वह सब के सब चकना चूर हो जाते है / जब दिल टूटता है तो ऐसा ही होता है /

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मेरे स्वभाव मे खिलन्दड़ा पन आने लगा /  अल्हड़्ता आने लगी और यही खिलन्दडा पन और अलःअड़ता अभी तक बनी हुयी है क्योन्कि जीने के लिये गम की नही और न फिक्र की जरूरत होती है / जीने के लिये बस यही एक रास्ता था / देवा नन्द और सुर्रैया की कहानी सुनकर मुझे लगा कि मै अकेला नही हू मेरे जैसे इतने महान लोग भी है /

बस तब से देवानन्द मेरे दिल और दिमाग मे घुस गये  और फिर जिन्दगी जीने का का रास्ता आसान हो गया / मै कुछ रचनात्मक कार्य करना चाहता था / अपना दुख भुलाने के लिये मैने सोचा कि ऐसा काम करन चाहिये जो जन सेवा से जुड़ा हुआ हो /

एक मैगजीन मे मैने पढा कि IF YOU CAN NOT BE A KING , BETTER YOU BE A PHYSICIAN.

मैने इन्टर्मीडियट साइन्स से परीक्षा पास की और उसके बाद ग्रेजुएशन करने के लिये एड्मीशन लेने वाला था कि मेरे मन मे यह विचार आया कि अगर सेवा करना है तो डाक्टर या चिकित्सा से समबन्धित कोर्स किया जाये / मैने आयुर्वेद मे एड्मीशन ले लिया / मै अपने को बिजी रखना चाहता था /

मेरे मन मे चोट लगी थी और मेरी इच्छा थी कि  कुछ ऐसा करू कि लोग मुझे याद रखें /आज मै ७० साल का हू लेकिन मेरा दिमाग मुझे २० साल का बनाये रखना चाहता है / और मै अपने को २० साल का ही समझता हू / यह एक विचित्र सी बात है / इसीलिये मेरी सारी एक्टीविटीज बिस साल वालो जैसी है /

मेरी प्रेमिका मुझे कभी भी   नही मिली / यह खलिश मेरे दिल मे आज तक मौजूद है / अभी भी उसकी याद करके मेरे मन की पीड़ा ताजा हो जाती है /

एक कहावत है कि BEHIND THE EVERY GREAT MAN THERE IS WOMEN 

यह सही है और बिल्कुल सही है , हर सफल और शीर्ष व्यक्ति के पीछे एक औरत जरूर होती है जैसे राज कपूर के पीछे नर्गिस, जैसे प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी के पीछे उन्की पत्नी जसोदा बेन मोदी , जैसे बिल क्लिन्टन के पीछे उनकी पत्बी हिलेरि क्लिन्टन जैसे अमिताभ बच्चन के पीछे जया बच्चन  / कहने का मतलब यह कि कोई न कोई स्त्री या महिला हर सफल व्यक्ति के पीछे अवश्य  होती  है /

देवानन्द के पीछे सुरैय्या का नाम क्या  जुड़ा , देवानन्द की फिजा बन गयी / सुरैया उस समय की सबसे मशहूर हीरोइन थी और देवानन्द जैसा कि सभी कहते है , एक नये कलाकार थे /इनकी प्रेम कहानी लगभग चार साल तक चली /

जैसा कि लोग बताते है कि सुरैया की शादी उन्की नानी के अवरोध  के   कारण नही हो पायी / यह सही है क्योन्कि अवरोध इस बात का जरूर होगा कि देवानन्द हिन्दू थे और सुरैया मुस्लिम / उस समय देश की सोसायटी बहुत कनजर्वेटिव किस्म  थी / वह यह सब नही बर्दाश्त किसी कीमत पर नही कर सकती थी कि एक मुस्लिम लड़्की किसी हिन्दू से शादी करे / मैने वह जमाना देखा है जिसमे धार्मिक कट्टरता और जातीय कट्टरता अति चरम सीमा मे लोगो के अन्दर   भरी ्होती थी और यह कट्टर पीढी किसी कीमत पर इस तरह के व्वयहार की इजाजत देना तो दूर सोच भी नही सकती थी / इसलिये कुछ भी कहा जाय नानी का कट्टर धार्मिक होना सुरैया की शादी मे बाधक बना / हलान्कि कुछ लोगो का कहना है कि देवानन्द सुरैया के प्यार को पाने के लिये मुसलिम धर्म स्वीकार करने को तैयार थे / फिर  बात मे रोड़ा क्या अटका यह बात समझ से परे है / केवल यही समझ मे आया है कि सुरैया की नानी को शाय्द लोग उल्टा सीधा समझा कर गुमराह कर रहे थे और नानी बहकावे मे आकर शादी के खिलाफ की ढाल बन गयी और नानी के कन्धे पर बन्दूक धर कर वे लोग अपना उल्लू सीधा करने मे कामयाब हो गये तो नही चाहते थे कि सुरैया की शादी देवानन्द से हो /

एक बात मुझे याद आ रही है कि ऐसा बताया गया कि जब सुरैया से आखरी बार  मिलने देवानन्द पहुन्चे और इन दोनो की मुलाकत हुयी तो जो खाका मेरे दिमाग मे बन रहा है उसके मुताबिक जब देवानन्द  चलने को हुये तो वे सुरैया के गले मिलकर बहुत फूट फूट करे रोये / बाद मे जब वह घर आये तो अपने बड़े भाई चेतन आनन्द के गले मिले और फूट फूट कर रोये /

फूट फूट कर और दहाड़े मार कर कोई भी वयक्ति तभी रोता है जब उसकी मन कॊ अवस्था किम्करतव्य विमूढ वाली हो जाती   है / यह हाई लेवल शाक HIGH LEVEL SHOCK POSITION की स्तिथि होती है जिसमे व्यक्ति को अपने प्रयासो का  अनुकूल नतीजा न मिलने के कारण  ADVERSE REACTION    प्रतिक्तिया स्वरूप होता है /

देवानन्द के लिये यही वह TURNING  POINT बना  जिसने देव कुमार पीरामल आनन्द को “देवानन्द” बना दिया /

एक और बात की अनालाइसिस करता हू / वह यह कि काम  न करने के लिये या बात बिगाड़ने के लिये या जिस कार्य को करना नही होता है उसके लिये सौ और हज़ार तरह के बहाने होते है / आप्को काम नही करना है तो आप सौ बहाने बनायेन्गे / मुझे मरीज को नही देखना ऐसा मैने सोच लिया है तो मै सौ तरह के बहाने बताकर उसको नही देखता /यही हाल देवानन्द के साथ हुआ होगा / नानी ने एक बार ठान लिया कि शादी नही करनी है तो नही करनी है उसके लिये सौ बहाने ढ्ण्ढे गये  और इसके पीछे शतरन्ज की बाजी लगाये लोग दूसरे के कन्धे पर बन्दूक धर कर निशाना किसी और पर साध रहे थे /

देवानन्द की फिल्मो मे  देव  कुमार पीरामल आनन्द  के मन की स्तिथि और उनके मन की पीडा बहुत जगह पर अयां हुयी है उनके मन की पीड़ा का expression अगर उनकी फिल्मो लो ध्यान से देखा जाय तो ऐसे बहुत से वाकये उन्होने फिल्मो मे फिल्माये है जो उन्होने सुर्रैय के साथ बिताये होन्गे / एक कलाकार बहुत कुछ अपने जीवन के बिताये गये पलो को मूर्त रूप देकर नये स्वरूप मे लोगो को देता है जो उसक व्यक्तिगत होता है /

ज्वेल थीफ  फिल्म मे  एक  गाना ” ये दिल न होता आवारा ”  के बीच मे एक सीन आता है जिस मे तनूजा  कार से उतर कर एक बड़ा सा डन्डा हाथ मे लेकर कार का दरवाजा खोलकर बाहर सड़क पर उतर कर खड़ी हो जाती है और फिर देवानन्द को  एक लम्बी सी छड़ी दिखाती है जिसे देखकर देवानन्द भागते है और घूमकर भागते है / मुझे लगता है कि ऐसा ही देवानन्द और सुरैया के बीच मे हुआ होगा /

यह ध्यान देने की बात है कि सुरैया की फिल्मे अगर देखी जांय तो आपको यह जानकर इस बात का नोटिस लेना चाहिये कि सुरैया ने कभी भी फिल्म शूट करने वाले  कैमरे के लेन्स की तरफ अपनी आन्ख   ्का रुख कभी भी नही किया है / या तो उसकी आन्ख दाहिनी तरफ जा रही होती है या फिर बायी तरफ / उसने कभी भी कैमरे की तरफ अपनी आन्ख का रुख कभी भी नही किया है / देवानन्द की कुछ फिल्मो मे यह  “आन्ख ” का फन्डा देखने को मिलता है / सी०आई०डी० मे शकीला ने भी कैमरे की तरफ आन्ख नही की है / यहा उल्लेख करना चाहून्गा कि देवान्न्द की अन्तिम इच्छा थी कि उनको मरने के बाद कैमरा न दिखाया जाय /

सुरैया की मौत के देवानन्द शायद मुम्बई मे ही थे / लेकिन देवानन्द सुरैया के अन्तिम सनस्कार मे नही गये / इसका कारण मेरी समझ मे यह आता है कि जब सुर्रैया और देवानन्द अन्तिम बार मिले होन्गे तो उन्होने यह ्प्रण किया होगा कि वे अब कभी भी एक दूसरे की शकल नही देखेन्गे और न कभी मिलेन्गे और अब उनके सारे रिश्ते टूट चुके है और यह भी कि कोई उनमे से दोनो का कोई एक भी एक दूसरे  का मरा हुआ चेहरा भी नही देखेगा / यही बात समझ मे आती है कि देव साहब क्यो नही सुरैया के अन्तिम सन्स्कार मे शामिल हुये ?

मैने  देव साहब की आटो बायोग्राफी    ROMANCING WITH LIFE  नही पढी है / पढने की इच्छा बहुत है लेकिन यह किताब मुझे मिली नही है / मैने देवानन्द द्वारा लिखे गये कुछ लेख हिन्दी सापताहिक पत्रिका “सापताहिक हिन्दुस्तान” नई दिल्ली के सन १९६० के लगभग प्रकाशित लेखो को बहुत दिल्चस्पी के साथ पढता रहा हू / एक लेख की शीर्षक थी ” मै पीछे मुडकर नही देखता” / यह लाइन मुझे बहुत ispire करती है /

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