गुर्दे के रोग ; बढे हुये क्रियेटिनाइन के बारे मे मेरा आबजर्वेशन


गुर्दे यानी KIDNEY किडनी कि बीमारिया इस दिनो बहुत देखने मे आ रही है /

सबसे पहले नम्बर पर  गुर्दे या किडनी की जो बीमारी है वह बढते हुये क्रियेटिनाइन लेवल की है /

क्रियेटिनाइन के बारे मे मेरा आबजरवेशन यह है कि

[१]  सामान्तया   क्रियेटिनाइन रक्त मे  .४ से लेकर १ मिलीग्राम/ डीएल होता है / कोई कोई लेबोरेटरी वाले सामान्य स्तर कुछ इससे अधिक या कम भी बताते है /

ऊपर बताया गया  यह  सामान्य लेवल किसी किसी मरीज मे बहुत तेजी से बढता है / ऐसा भी देखा गया है कि यह लेवल प्रत्येक दिन   चौथायी से लेकर आधा मिली ग्राम यानी .२५ मिलीग्राम से लेकर .५ मिलीग्राम के लेवल तक प्रतिदिन बढता है /मरीज एक बार परीक्षण कराकर अपना क्रियेटाइन लेवल की माप करा लेते है / वे यह समझते है कि अब यह स्थित स्थिर  रहेगी जैसा कि अन्य दूसरे परीक्षनो के बारे मे लोग समझते है /

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लेकिन किसी किसी मरीज को ऐसा होना उल्टा  साबित होता है

यह लेवल तीन तरह के मरीजो मे अब तक अलग अलग तरह से सामने देखने मे आया है

[अ]  कुछ ऐसे मरीज देखने मे आये है जिनका क्रियेटिनाइन लेवल  एक अवस्था मे ही बना रह्ता है / यह न घटता है और न बढता है / जब भी रक्त का टेस्ट कराया जाता है क्रियेटिनाइन लेवल वही निकलता है / .१ पाइन्ट से लेकर .३ तक घटता बढता रहता है / कभी कम कभी ज्यादा बस इससे अधिक या कम नही उदाहरण के लिये एक मरीज का क्रियेटिनाइन लगभग चार साल से ३.३ से लेकर ३.५ के बीच मे बना रहता है / ऐसा मशीनी गड़बड़ी के कारण हो सकता है या मरीज जब परीक्षण कराने जाता है उस समय कम पानी पिया गया हो य थका हुआ हो इसके कारण यह हो सकता है /

जब भी टेस्ट किया जाता है यही रीडिन्ग मिलती है / इस तरह के मरीजो मे रक्त की अन्य कोई दूसरी anomalies  नही मिलती है / रक्त के दूसरे पैरामीटर सामान्य निकलते है / अक्सर मरीज थकावट या शारीरिक कमजोरी अथवा    मान्सपेशियो मे थकावट की शिकायत करते है /

[ब] कुछ ऐसे मरीज है जिनका क्रियेटिनाइन बढता है तो उसके साथ मे उसी अनुपात मे रक्त का SGPT और ALKALINE PHOSPHATE और BLOOD UREA भी बढ जाता है  / उदाहरण के लिये अगर मरीज का क्रियेटिनाइन लेवल ५ मिलीग्राम के लगभग है तो SGPT  ७६ या कम या इससे अधिक और ALK PHOS  92  कम या इससे अधिक और BLOOD UREA  103  या कम या अधिक हो जाता है / इन मरीजो मे क्रियेटिनाइन बढने की स्पीड धीमे होती है और धीमे धीमे बढती है /

[स] कुछ मरीजो मे देखा है जो क्रियेटिनाइन लेवल को बहुत तेजी से शरीर मे बढाता है और शरीर की हालत को  बहुत खतरेनाक स्तिथि मे पहुन्चा देता  है / ऐसे मरीजो का हाल खतरनाक लेवल तक बहुत शीघ्रता से पहुन्चने लगता है और फौरी तौर पर  आनन फानन मे डायलिसिस की नौबत आ जाती है /

ऐसे मरीजो  मे सबसे खराब बात यह होती है कि जैसे जैसे  रक्त के अन्दर  एक तरफ  क्रियेटिनाइन लेवल बढता जाता है तो दूसरी तरफ रोगी का  होमोग्लोबिन उसी अनुपात मे  कम होने लगता है / इसके साथ साथ ब्लड य़ूरिया भी बढने लगता है / उदाहरण के लिये अगर क्रियेटिनाइन लेवल ४ पर है तो हीमोग्लोबिन का लेवल १० के आस्पास हो जाता है / जब क्रियेटिनाइन ५ के आस्पास होगा तो हीमोग्लोबिन ८ के आस्पास हो जाता है / जब क्रियेटिनाइन ६ के आसपास होगा तो हीमोग्लोबिन ७ के आस्पास हो जाता है / जब क्रियेटिनाइन का लेवल ९ के आस्पास होता है तो हीमोग्लोबिन का लेवल २ के आसपास हो जाता है / ऐसी सिथि मे खून चढाने की जरूरत पड़ जाती है / ब्लड यूरिया भी बढना शुऋ हो जाता है और इस्का लेवल ३०० से लेकर ५०० के आस्पास कम या अधिक लेवल का हो जाता है / जबकि इसका सामान्य लेवल  अधिकतम ४० से लेकर ६० तक होना चाहिये /

हमारे यहा गुर्दो की क्रियेटिनीन बढने की  इस तरह की बीमारी के  इलाज के लिये आये मरीजो के परिणाम पहले और दूसरे लेवल के लिये बहुत उत्साह वर्धक रहे है /

आयुर्वेदिक और आयुष यानी  होम्योपैथी और यूनानी  दवाओ के कम्बाइन्ड ट्रीट्मेन्ट से  मरीजो का क्रियेटिनाइन लेवल का बढना रुक गया और धीरे धीरे क्रियेटिनाइन का स्तर कम हुआ लेकिन यह सामान्य स्तर तक नही पहुन्च पाया और २.५ तक ही बना रहा है / किसी किसी मरीज के इलाज मे यह स्तर बहुत धीमी गति से नीचे आता है / इलाज के दर्मियान खान पान मे और जीवन शैली मे बदलाव जैसा  परहेज करने  की हिदायते दी गयी है / इससे मरीजो का क्रियेटिनीन बढा नही बल्कि धीमे धीमे कम की तरफ आता है / लेकिन स्तर सामन्य लेवल को नही छूता है , यह देखने मे आया है /

लेकिन तीसरे स्तर के मरीजो के इलाज  मे बहुत  अच्छे परिणाम नही मिले है / इसका कारण मेरे  एनालाइसिस  से कुछ इस तरह निकल कर सामने आता है /

क्रियेटिनीन बढने के साथ साथ खून का कम होना या खून का कम बनना और हीमोग्लोबिन का लेवल इस कारण से कम होना यह अवश्य इन्गित करता है कि हीमोग्लोबिन बनाने कि प्रक्रिया मे कही न कही गड़बड़ी पैदा होती है / यह दो वजह से होता होगा / पहला बोन मैरो मे किसी तरह की विकृति और दूसरा हड्डियो के सन्धि स्थल मे बदलाव का होना /

इसी कारण से इस तरह की क्रियेटिनीन लेवल के बढने वालो रोगियो को मलेरिया बुखार या टाइफाइड बुखार जैसे लक्षण पैदा हो जाते है / जिन मरीजो को इस तरह की शिकायते हुयी है उनका कहना था कि उनको मलेरिया का इलाज किया गया और फिर टायफाइड का लेकिन उनको आराम नही मिली उलटे महीने दो महीने बाद उन्की खून की जान्च करायी गयी तो क्रियेटिनीन बढा हुआ मिला और जब यह पता चला तो एक दो हफ्ते मे ही क्रियेटिनीन बढकर हाई लेवल १० से १३ तक पहुन्च गया और फिर डायलिसिस की  नौबत आ गयी /

इस तरह के मरीजो के ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण करने पर spleen and pancreas and liver and gall bladder and small and large intestines की विकृतिया सामने आयी है / यह cumulative problems  homostatically पायी गयी है / Digestive system and autonomic nervous system and neuro-musculo-skeletal systems  के involve  होने का पता चलता है / हर मरीज के individual  लेवेल के data  आते है और उन्ही डाटा का एनालिसिस और सिथेसिस करके आयुर्वेद और आयुष दवाये प्रेस्क्राइब की जाती है /

इस तरीके  से इलाज करने से ऊपर बताये गये दो लेवल के रोगियो को अवश्य  क्रियेटिनीन लेवल बढने से रुक जाते है /

हमारा प्रयास लगातार तीसरे लेवल के मरीजो को फायदा पहुचाने के लिये रिसर्च लेवल पर चल रहा है / इसमे हमे आन्शिक सफलता    भी मिली है / लेकिन अभी हमारा प्रयास   जारी है कि किस तरह से ऐसी स्तिथि कि बढने से रोका जा सके अथवा इसके बढने की स्पीड को कम किया जा सके /

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