स्कूल जाने वाले बच्चो मे कन्धे और पीठ और सीने यानी चेस्ट केज और कमर मे दर्द की शिकायत और रीड की हड्डियो मे पैदा हो रही बीमारियां


मुझे शहर और देहात दोनो क्षेत्रो मे मरीजो को देखने का अवसर रोजाना और अक्सर मिलता रहता है /

कई बार स्कूल जाने वाले बच्चे अपने मा बाप से शिकायत करते है कि उनको सिर मे दर्द रहता है या उनके कन्धे दर्द करते है या उनकी गर्दन और पीठ दर्द करती है या उनकी कमर दर्द करती है या उनके दोनो पैर दरद करते है /

पहले जब इस तरह की शिकायते बच्चो के माता पिता करते थे तो मै इन सब्को नजर अन्दाज करता था और इसे बहुत ही मामूली किसम की आये दिन की तकलीफो से जोड़ दिया करता था / मेरा अनुमान था कि बच्चे परिवार मे आये दिन अपने माता पिता को गठिया वात या पीठ का दर्द या कमर का दर्द या कन्धे का दर्द या हाथ का दर्द की शिकायते सुनते रहते है इसलिये बच्चो के नाजुक स्वभाव के कारण और मा बाप से सहानुभुति रखने के कारण ऐसा कहते होन्गे /

यह भी हो सकता है कि उनको गले की लैरिन्गो फैरिन्गियल ट्रकियल अथवा ई०एन०टी० की बीमारी हो इसलिये इन तकलीफो का किसी तरह का रिफ्लेक्शन हो और फिर इस तरह के सिन्ड्रोम्स आ गये हो /

लगभग एक साल पहले एक दिन मेरी पोती ने जो दस साल की है उसने मुझसे शिकायत की उसे सीने मे दर्द होता है / उस समय बरसात का सीजन चल रहा था मैने विचार किया कि यह दर्द बर्साती हवाओ से हो सकता है या फिर यह सब ए०सी० मे सोते है या ठन्डे पानी से स्नान करते है इस कारण से मस्कुलर स्पास्म जैसी शिकाय्त हो सकती है क्योन्कि पोती की जान्च करने के बाद मुझे कुछ भी एब्नार्मल नही मिला /

मै प्रत्येक इतवार सोनिया गान्धी के चुनाव क्षेत्र मे यानी जनपद राय बरेली मे कस्बा भोज पुर मे स्तिथि “भारत रत्न राजीव गान्धी स्मारक आयुर्वेद शोध सन्स्थान , भोज पुर, पूरे पान्डे रोड, रायबरेली , उ०प्र० ” मे मरीजो को देखने और उनकी जान्च और उनके आयुर्वेदिक और आयुष इलाज के लिये यहा आता जाता रहता हू /

ज्यादातर मै अपनी कार से ही वहा मेरा आना जाना होता है जिसमे मै अपनी कुछ गिनी चुनी मशीने और मानीटर लेकर जाता हू जो पोर्टेबुल है और बैटरी से चल जाती है क्योन्कि वहा पावर सप्लाई की बहुत समस्या है / वहा सब मशीने लेकर जाना सम्भव नही होता इसलिये जरूरी मशीनो को ले जाता हू / क्योन्कि कार मे लाद कर ले जाने मे मुझे कुछ भी असुविधा नही होती है /

लेकिन जब मै कार से नही जाता और मुझे बस से जाना होता है तो मै अपने बैक पैक मे १० से लेकर १५ किलो तक की मशीने पीठ मे लाद कर ले जाता हू /वहा पहुचने मे पैदल और बस और मोटर साइकिल का लम्बा सफर तय करना होता है जिसमे कई घन्टे लग जाते है / आने जाने मे पूरा दिन बर्बाद हो जाता है और लगभग १७५ किलोमीटर का सफर तय करना होता है / इलेक्ट्रानिक मशीने बहुत नाजुक होती है इसलिये मै बस मे या पैदल या मोटर साइकिल मे उनको अपनी गोद मे या कन्धे मे लटकाये रहता हू /

रात मे जब मै सोने लगता तो मेरे कन्धे और गर्दन और पीठ और सीने मे दर्द होना शुरू हो जाता और सारा हिस्सा अकड़ जाता / पहले मै यह समझा कि मुझे स्पान्डिलाइटिस की पुरानी तकलीफ है और मै ए०सी० मे सोता हू , कम्प्य़ूटर मे भी झुक कर काम करता हू इसलिये ऐसा होगा /

कुछ हफ्ते मुझे बार बार रायबरेली जाना पड़ा / इससे मेरी तकलीफ और बढ गयी / अब मै चिन्तन करने लगा कि मुझे ऐसी तकलीफ क्यो और कैसे बढी है और इसका कारण क्या है / मैने वाच करना शुरु किया और जल्द ही पता चल गया कि यह सब मेरा मशीने से भरे १० या १५ किलो बैक पैक के लादने के कारण है /

मैने बैक पैक लादना छोड़ दिया और एक करमचारी रख लिया जो सब सामान ले जाने लगा / मेरी तकलीफ धीरे धीरे ही सही , ठीक होने लगी /

मेरी पोती ने फिर शिकायत की कि उसे कन्धे और सीने मे दर्द होता है / मै समझ गया कि जितना इस्का वजन नही है उससे ज्यादा तो यह सामन उठाती है और लेकर आती जाती है / यह दर्द उसी के कारण है / मैने बहू और लड़्के से कहा कि इसका बस्ता हल्का करो तभी इस समस्या से निजात मिलेगी /

मेरा लड़्का बच्चो को कार से ले जाता है और ले आता है बच्चो के बैक पैक को अधिक देर तक कन्धे मे न लादने से उनकी यह समस्या दूर हुयी है /

मेरे पास इस तरह की शिकायत लेकर आने वाले बच्चे और उनके माता पिता को मै हिदायत करता हू कि यह सब बस्ते के वजन के कारण है जो बच्चो के नाजुक कन्धे सहन नही कर पाते है और इस तरह की आगे चलकर भविष्य मे गम्भीर बीमारियो को आमत्रण देते है /

बड़ी तेजी से बढ रही रीढ की हड्डियो की बीमारियो का यह एक बड़ा कारण हो सकता है / आज कल न्य़ूरोलाजिकल बीमारिया भी बहुत बढ रही है यह रीढ की हड्डी के कम्प्रेशन से भी हो जाती है / मैने बहुत से मरीजो को देखा है जिनकी बीमारी की वजह रीढ से समबन्धित थी / उनके केस को कई पोस्ट मे जिक्र किया है /

यह सोचने का काम समाज और सरकार का है कि इस तरह से बच्चो को किताब का बस्ता लादकर उनको बीमार बना देना कहां तक उचित होगा ?

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