दिन: सितम्बर 17, 2016

डेन्गू और चिकन गुनिया और दूसरे वायरल बुखार का आयुर्वेदिक और आयुष उपचार


इस बार बरसात के दरमियान डेन्गू और चिकन गुनिया के वायरल बुखार के कारण देश के विभिन्न हिस्सो से लोगो के मरने और परेशान होने की शिकायते मिली है /

वायरल बुखार का जिस तरह से मैने उपचार किया है उसका अनुभव मै सबके साथ शेयर कर रहा हू /

१- आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी और अलोपैथी के काम्बीनेशन इलाज से यह बुखार तीन से पान्च दिन मे बहुत सुगमता के साथ ठीक हो जाता है

२- यह बहुत सेन्सिटिव बुखार है इसलिये इसका इलाज बहुत सोच समझ कर करना चाहिये / लापरवाही जान्लेवा हो सकती है /

३- आयुर्वेदिक औषधि महासुदर्शन घन वटी २ गोली, आनन्द भैरव रस दो गोली , महा ज्वरान्कुश रस दो गोली चार चार घन्टे के अन्तर से खाना शुरु कर देना चाहिये

४- COMBIFLAM TABLETS को चार चार घन्टे के अन्तर से खिलाना चाहिये

५- homoeopathic tincture्स का मिश्रण दिन मे दो बार देना चाहिये
बराबर मात्रा मे नीचे लिखे होम्योपैथिक मदर टिन्क्छर को मिला ले और इसका एक से लेकर दो चम्मच तक आधा कप पानी मे मिलाकर दे

अ- TINOSPORA CARDIFOLIA Q
B- AZADIRACHTA INDICA Q
C- CHIRAYATA Q
D- KALMEGH Q
E- ECHINESIA Q

६- यूनानी के अर्क चिरायता, अर्क उस्बा, अर्क मुन्डी प्रत्येक २५ मिलीलीटर लेकर बराबर पानी मिला ले और फिर इसको दिन मे कई बार पीना चाहिये

इतने उपचार से बहुत सुगमता और सरलता से यह बुखार ३ से पान्च दिन के अन्तराल मे ठीक हो जाता है

रोगी को पूरी तरह से बिस्तर पर आराम करना चाहिये और शारीरिक श्रम बिल्कुल नही करना चाहिये / हल्का खान पान यथा ब्रेड मक्खन, आलू की टिकिया , चाय, दूध , बिस्किट आदि खाना चाहिये /

शीघ्र आने वाले बुखार का यदि जितनी जल्दी उपचार करेन्गे तो यह जल्दी ठीक हो जाता है /

लापरवाही करने से यह बहुत खराब स्तिथि मे होता तब यह जान लेवा साबित हो स्कता है

यह मेरे observation मे आया है कि जो रोगी या जो लोग आयुर्वेद के आसव और अरिष्ट का बरसात के दिनो मे सेवन लगातार खाने के बाद किया करते है उनको वायरल बुखार से बचाव होता है / या तो ऐसे रोगियो को वायरल का अटैक नही होता और यदि होता है तो बहुत मामूली सा जो एक या दो दिन के उपचार से ठीक हो जाता है / इससे ऐसा लगता है कि वायरल का अटैक आन्तो के जरिये पूरे शरीर मे फैलता है / आयुर्वेद के आसव मे कुदरती यीस्ट और कुदरती विटामिन बी काम्प्लेक्स पैदा हो जाता है / आसव मे गुड़ का उपयोग करते है / गुड़ मे मिनरल और अन्य कई तरह के कुदरती पोषण पदार्थ होते है जिनके कारण यह इसके साथ फर्मेन्टेद जड़ी बूतियो के गुण आ जाते है , घुल जाते है / इस कारण से यह बहुत उच्चकोटि की दवा बन जाती है /

आयुर्वेद के आसव हमेशा खाने के बाद प्रयोग किये जाते है / पाचन सनस्थान के लिये यह बहुत उच्चकोटि की औषधि है / आन्तो के अन्दर पनपने वाले वायरल कीटाणु आसव के प्रभाव से न्यूट्रल हो जाते है और वायरस का असर शरीर पर नही पड़ता है / ऐसा मेरा मानना है /

इसलिये मेरी सलाह है कि यदि वायरल के प्रभाव से बचना है तो आयुर्वेद के आसव का उपयोग करना चाहिये ताकि इस वायरल की बीमारी से बचा जा सके / इस बिन्दु पर आयुर्वेद के छात्रो को रिसर्च करना चाहिये और इसके क्या परिणाम मिलते है , यह देखना चाहिये /