एच०आई०वी० के मरीजो मे काप्लीकेशन्स डिसआर्डर्स ; COMPLICATION DISORDERS IN H.I.V. PATIENT


एच०आई०वी० के मरीजो की बड़ी सन्ख्या मे इलाज करने के बाद मुझे जिस तरह का अनुभव मरीजो के इलाज के साथ साथ हुआ है, उसके बारे मे जिस तरह का अनुभव हुआ है वह मै सबसे शेयर करना चाहता हूं /

पहला अनुभव यह रहा है कि रोगी जितनी जल्दी चिकित्सा के लिये डाक्टर के पास आता है उसे उतनी ही जल्दी बीमारी से बचने का रास्ता मिलता है / जैसे ही यह शक हो कि उसे एच०आइ०वी० होने का खतरा है , उसे तुरन्त ही आयुर्वेदिक और आयुष या कोई भी दूसरा इलाज शुरू कर देना चाहिये / हमारे यहा ई०टी०जी आयुर्वेदास्कैन और अन्य दूसरी पथोलाजिकल जान्चे किये जाने की सुविधा है और एच०आई० वी० से सम्बन्धित वे सभी जान्च की जाती है जिनमे ब्लड और यूरिन और अन्य किसम की जान्च होती है जिन्ससे शरीर के अन्दर होने वाली एनोमेलीज का पता लगाया जा सकता है / सारा डाटा मिल जाने के बाद आयुर्वेद और आयुष का इलाज करने से प्रारम्भि अवस्था का एच०आई०वी सन्क्रमण समाप्त होता है, ऐसा मेरा मना है / हलान्कि मै मरीजो को सलाह देता हू कि वे हर चार महीने या छह महीने के अन्तराल से अपना सी डी ३ और सी डी ४ और सी डी ८ काउन्ट बराबर जान्चते रहे / इस तरह की मानिटरिन्ग करने से एच०आई०वी० का सन्क्रमण बढता नही है बल्कि शान्त अवस्था मे पड़ा रहता है और सक्रिय नही होता है /

दूसरा अनुभव यह रहा है कि ए०आर०टी० इलाज कराने के बावजूद भी बहुत से रोगी अथवा रोगुयों की स्वास्थय की हालत as it is यानी जस के तस बनी रही और उनको किसी तरह का फायदा नही हुआ / बहुत से ऐसे मरीज इलाज के लिये आये है जो १० अथवा १५ साल से ए०आर०टी० की टिकिया खा रहे थे और उनको कोई भी remarkable फायदा नही हुआ / ऐसे मरीजो के उनके सी०डी० काउन्ट भी बढते रहे अथवा घटते रहे और किसी तरह का बुनियादी परिवर्तन नही हुआ / हमारे यहा ऐसे मरीजो की सन्ख्या इलाज के लिय बड़ी सन्ख्या मे आयी है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्शन के अलावा अन्य दूसरे परीक्षण करने के उपरान्त आयुर्वेद और आयुष का इलाज किया गया उससे बड़ी सन्ख्या मे मरीजो के सी०डी० काउन्ट सामान्य स्तर पर आ गये अथवा बार्डर लाइन पर स्थापित हुये हैं / इससे यह निष्कर्ष निकाला जा स्कता है कि दिया गया इलाज एच०आई०वी० मे प्रभाव शाली है / यह जरूर है कि हमारे यहा आयुर्वेदास्कैन परीक्षण और अन्य दूसरे परीक्षण के बाद ही इलाज किये जाने की व्यव्स्था है,इसलिये जरूरी होता है कि पहले परीक्षण करके सब पता किया जाय कि किस तरह की problems और anomalies शरीर के अन्दर जन्म ले रही है / उसी अनुसार इलाज करने से H.I.V. की बीमारी पर नियन्त्रण करने का प्रयास किया जा स्कता है / बहुत से मरीजो मे सफलता मिली है लेकिन ऐसे भी मरीज है जिनमे सफलता तो नही मिली लेकिन उनकी तकलीफे बढी नही, उनके स्वास्थय मे सुधार हुआ, उनको किसी तरह की परेशानी का अनुभव नही हुआ लेकिन सी०डी० काउन्ट परीक्षण कराने मे बहुत महत्वपूर्ण बदलाव भी नही हुये है / ऐसा भी देखने मे आया है , हलान्कि यह सभी मरीज आयुर्वेद और आयुष का इलाज बाकयदा ले रहे है और अपना जीवन का कार्य सामन्य व्यक्ति की तरह से ही कर रहे है /

तीसरा अनुभव H.I.V. मरीजों के साथ यह रहा है कि जब एच०आई०वी का सन्क्रमण बढता है , यह हमेशा मरीज की लापरवाही की आदत और दवाओ के ठीक ठीक सेवन न करने और डाक्टर की राय न follow करने की वजह से होता है / ऐसे सन्क्रमण के बढने से पहला रियक्शन यह होता है कि रोगी को मलेरिया जैसा बुखार आने लगता है या टायफायड जैसा बुखार आने लगता है / यह बुखार आना इस बात का सन्केत होता है कि रोगी का इन्फेक्शन का लेवल बढ रहा है / H.I.V. CARD से टेस्ट करने पर hiv 1 – hiv2 दोनो ही positive मिलते है / ऐसे लक्षण होने पर खून की जान्च करने पर Heamoglobin का प्रतिशत सामान्य से बहुत कम और ESR का लेवल सामान्य से ज्यादा यानी दोनो ही घटे और बढे हुये मिलते है / किसी किसी रोगी को टेस्ट कराने पर typhoid या malaria या tuberculosis की बीमारी का पता चलता है और ऐसे मरीजो मे कभी कभी एच०आई०वी० पाजिटिव नही मिलता है जब्कि वे पहले से h.i.v. positive होते हैं /

ऐसे रोगियों के बारे मे मेरा मानना है और इस बात मे शक की गुन्जायश भी शामिल है कि कही यह auto-immunity का मामला तो नही बनता है ? ठीक उसी तरह से जैसे सभी डाक्टर मरीजो को देखते देखते और उनकी जान्च करते करते auto-immune हो जाते है / एक बात और है जो समझने लायक है वह यह कि जब हर साल बरसात के दिनो मे या मौसम बदलने के समय , बीमारी फैलाने वाले वायरस अपना चोला यानी आकार बदल कर कोई नये किस्म की बीमारी फैला देते है , इसलिये कही यह तो नही होता कि h.i.v. का वायरस typhoid अथवा malaria अथवा tuberculosis के वायरस या बैक्टीरिया के साथ मिल जाता हो या convert करता हो और फिर टेस्ट करने पर hiv का वायरस न पकड़ मे आने के बजाय टेस्ट में यह बताये कि tubercular infection है ? ्नतीजा बहुत confusion पैदा करता है कि मरीज को टी०बी० का इलाज किया जाये या एच०आई०वी० का / क्योन्कि अगर एच०आई० वी० का इलाज करते है या टी०बी० का इलाज करते है तो सन्शय इस बात का बना रहेगा कि मरीज को बीमारी जिसका इलाज कर रहे है वह है भी या नही है / ऐसे मे चिकित्सा कार्य सही नही हो सकता है /

चौथी बात यह अनुभव मे आयी है कि hiv के मरीजो को खून की कमी के साथ साथ serum creatinine बढने की बीमारी पैदा होती है / हीमोग्लोबिन पेर्सेन्टेज एक तरफ कम होने लगता है और दूसरी तरफ सिरम क्रियेटीनाइन बढता चला जाता है / हलाकि यह अचानक नही होता है यह धीरे धीरे बढता है और गर मरीज सावधान रहे और मुकम्म्ल इलाज करता रहे तो फिर क्रियेटीनाइन लेवल एक स्तर तक बना रह्ता है / म्रीज द्वारा की गयी एक भी साधारण सि गलती या जरा सी भी गलती उसके लिये जान लेवा साबित हो सकती है / इसलिये एच०आई० वी० के रोगी को हमेशा हर महीने हीमोग्लोबिन और क्रियेटीनाइन दोनो का परीक्षण कराते रहना चाहिये /

पान्चवी बात यह समझ मे आयी है कि hiv के रोगी को अगर डायबिटीज हो जाती है तो यह बहुत खतरनाक साबित होता है / ऐसी स्तिथि मे मरीज दिन पर दिन कम्जोर होता जाता है और उसका शारीरिक पतन होता चला जाता है /

एक बात जो सबसे महत्व पूर्ण है , वह यह कि जैसे ही मरीज को पता चले कि उसको एच०आई०वी० सन्क्रमण होने की आशन्का है , मरीज को आयुर्वेद या आयुष का इलाज बिना देर किये शुरू कर देना चाहिये / शरीर की Physiology मे pathological परिवर्तन होने से पहले अगर यह सब करते है तो इससे फायदा ही होगा / अगर इनफेक्शन नही भी है तो शरीर का detoxification हो जायेगा और अगर infection है तो सन्क्रमण का इलाज होकर शरीर detoxify हो जायेगा / ऐसा मैने अनुभव किया है /

H.I.V. के मरीजों के complications और दूसरे disorders को देखने और समझने मौका मुझे मिला है और इसके अलावा मुझे और भी अनुभव HIV के मरीजो के काम्पलीकेशन्स के बारे मे हुये है , उनको मै फिर कभी आप सबके साथ शेयर करून्गा /

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