दिन: जून 16, 2017

E.N.T.O. : Ear, Nose, Throat , Ophthalmic Disorders cure by AYURVEDA – AYUSH Treatment and management ; आन्ख, नाक, कान,गला , दान्त, मसूढे, जीभ, मुख आदि से सम्बन्धित रोग आयुर्वेद और आयुष इलाज और बताये गये परहेज से अव्श्य ठीक होते है


आन्ख, नाक, कान, मुख, दान्त, गला, जीभ, तालू आदि अन्गो से सम्बन्धित सभी रोग आयुर्वेद की चिकित्सा से अवश्य ठीक होते है /

आयुर्वेद मे ऊपर बताये गये सभी भाग अथवा अन्ग यह सभी मिलकर” त्रिक स्थान या उर्ध्व जत्रु ” कहते है / गले से ऊपर यानी THROAT PIT  यानी  गले से लेकर पूरी गर्दन  और सम्पूर्ण सिर  और सिर के पीछे रीढ की हड्डी तक का पूरा भाग जिसमे CERVICAL REGION  आता है / इसमे कुछ आयुर्वेद के ग्यानियो का मानना है कि इसके साथ दोनो हाथ भी शामिल हैं / हलान्कि सम्पूर्ण त्रिक स्थान के निर्धारण के मामले मे आयुर्वेद के विग्यानियों मे कुछ मतभेद है, लेकिन उर्धव जत्रु रोग के बारे मे जैसा आयुर्वेद मे कहा गया है , वही सब स्वीकार करते है / यानी दोनो हाथ और गले से ऊपर के सभी अन्ग जिसमे thyroid glands  भी शामिल होती है /

 

 उपरोक्त  माडल मे देखने से शरीर के आन्तरिक भागो का कैसी बनावट है यह पता

                                 चलता है / इसके अलावा उन अन्गो की बीमारियो का आन्तरिक क्या सम्बन्ध हो

                                                                   सकता है , यह भी देखकर समझा जा सकता है /      

उर्ध्व जत्रु सन्स्कृत भाषा का शब्द है जिसका आयुर्वेद के मतानुसार अर्थ है गले से ऊपर के भाग और अन्ग और इन अन्गो से सम्बन्धित रोग और रोग निदान और चिकित्सा से बोध करता है /

इसलिये यह आयुर्वेद मे व्यापक सन्दर्भ मे लिया जाता है / जैसा कि आधुनिक विग्यान भले ही सुविधा के अनुसार यह मानता हो कि शरीर के सभी अन्ग अलग अलग है और इन सभी अन्गो के सन्योजन से शरीर का निर्माण होता है इसलिये शरीर के अलग अलग अन्गो के हिसाब से अलग अलग इलाज भी होना चाहिये / यह आधुनिक चिकित्सा विग्यान की सोच है कि मानव शरीर को वह अलग अलग एक मशीन की तरह से चिकित्सकीय़ ड्रूष्टिकोण से देखता है , उदाहरण के लिये मानव शरीर को मानव शरीर न समझ कर एक तरह की मशीन समझा जाता है जैसे एक कार के अन्दर की रचना होती है उसी तरह मानव के शरीर की रचना आधुनिक चिकित्सा विग्यान के दृष्टिकोण से की गयी है / कार की पेट्रोल की टन्की को डाय्जेस्टिव सिस्टम के बराबर समझिये ,  कार के इन्जन को  मनुष्य के हृदय की तरह समझिये, पहियो को मानव के हाथ पैर समझिये, गेयर , एक्सीलेटर और ब्रेक को दिमाग का हिस्सा समझिये, स्टार्ट स्विच को मष्तिष्क का मोटीवेशन समझिये , बाहरी हिस्से को त्वचा समझिये / यह कान्सेप्ट ही मानव को एक मशीन का दर्जा देता है / आप यह तो जान्ते होन्गे कि कार जब खराब हो जाती है तब इसे कहां ले जाते है ? सभी कहेन्गे कि गेराज मे या कार बनाने वाले मिस्त्री के पास /

ठीक इसी तरह से जब मनुष्य बीमार होता है तो उसे नर्सिन्ग होम या अस्पताल ले जाते है / कार के लिये गेराज और मनुष्य के लिये नर्सिन्ग होम / कार मे जब कोई खास किस्म की गड़्बड़ी होती है तो उसे उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जिस विभाग मे उसके ठीक करने वाले जान्कार होते है / ठीक उसी तरह से इन्सान को उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जहां खास किस्म के विशेष्ग्य डाक्टर होते हैं / अब आप समझ गये होन्गे कि इन्सान को क्यो HUMAN MACHINE कहा गया है /

लेकिन इसके ठीक उलट आयुर्वेद  मानव शरीर को एक सम्पूर्ण ईकाई की तरह समझता है / यानी शरीर एक है जिसमे बहुत से अन्ग है और सिस्टम है जो एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे पर आश्रित है और एक दूसरे को सपोर्ट करते है / इसलिये अगर शरीर बीमार है तो उसे एक ईकाई की तरह समझ कर रोग-निदान और तदनुसार  चिकित्सा व्यवस्था करना चाहिये / ऐसा कान्सेप्ट आयुर्वेद का है /

इसलिये अगर उर्ध्व जत्रु के रोग हो तो यह अकेले नही होते है, यह सम्मिलित होते है / उर्ध्व जत्रु के मरीजो के इलाज करने से प्राप्त जैसा अनुभव मुझे हुआ है वह मै आप्के साथ शेयर करना चाहता हूं /

१-  सानुसाइटिस बीमारी के मरीजो मे नाक की तकलीफ के अलावा दूसरे सिन्ड्रोम्स भी मिलते हैं / जैसे कि पेट न साफ होना और कब्ज बना रहना, हल्का निम्न कोटि का बुखार या हरारत , कान मे दर्द और गले मे दर्द, सारे शरीर मे दर्द और सिर दर्द , भूख का न लगना ऐसी बीमारिया साथ मे हो जाती है / किसी किसी को चक्कर आने की बीमारी हो जाती है और कोई कोई तो बेहोश तक हो जाते है जैसे कि उनको मिर्गी का दौरा पड़ गया हो /

२- चेहरे के न्यूरेल्जिक दर्द  यानी फेसियल न्यूरेल्जिया के कुछ रोगियो का इलाज करने के बाद मुझे अनुभव हुआ है कि ऐसा दर्द दान्त की तकलीफों से भी होता है / दान्त की जड़ मे दर्द न होकर यह दर्द डायस्टल एरिया यानी नर्व एन्डिन्ग तक जाता है जो चेहरे कि नर्व सप्लायी को प्रभावित करती है तथा दर्द पैदा करती है / यह दर्द न्य़ूरो-मस्कुलो होता है / इससे चेहरे की पतली मान्शपेशिया प्रभावित होती हैं / पतली मान्शपेशियो के प्रभावित होने के कारण जब ठडक या ठडि हवा या ए०सी० की हवा लगती है तो यह दर्द और अधिक बढ जाता है और बहुत भयन्कर रूप ले लेता है / चेहरे की माशपेशियो मे सूजन आने के कारण यह टीपिकल किस्म की बीमारी बन जाती है जिसे लाइलाज बता दिया जाता है / यह भले ही एलोपैथी के डाक्टरो का मत हो कियह बीमारी लाइलाज है लेकिन ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज करने से इस बीमारी से छूटकारा मिल जाता है क्योन्कि उर्ध्व जत्रु रोगो की चिकित्सा सम्मिलित होती है /

३- थायराइड का रोग भी उर्धव जत्रु रोगो की श्रेणी मे शुमार किया जाता है / इसका इलाज भी आयुर्वेद के मतानुसार करने से अवश्य सामान्य अवस्था मे बना रह्ता है /

इसी तरह आन्ख और कान के ऐसे बहुत से रोग है जिनका इलाज आयुर्वेद मे सम्भव है लेकिन व्यापक जागरुकता न होने के कारण लोग बीमारियो को लाइलाज समझ लेते है और इस तरह से जो बीमारी ठीक हो सकती है उसको भी अग्यानता के कारण इलाज न कर पाने से जीवन भर भोगते है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण के अलावा अन्य परीक्षणो से प्राप्त रिपोर्ट्स के निष्कर्ष से आधारित आयुर्वेद -आयुष के काम्बीनेशन और इन्टीग्रेटेड इलाज से ऐसी सभी बीमारियों मे आराम मिलता है जिन्हे लाइलाज बता दिया गया हो /

 

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