रीढ की हड्डियो के विभिन्न भागों की बीमारिया ; आयुर्वेद-आयुष के काम्बीनेशन / इन्टीग्रेटेड उपचार से आरोग्य सम्भव ; SPINAL CORD’S SECTIONS DISORDERS CAN BE WELL TREATED BY AYURVEDA-AYUSH COMBINATION AND INTEGRATED TREATMENT AND MANAGEMENT


रीढ की हड्डी की बीमारियों के उपचार के लिये आधुनिक चिकित्सा विग्यान ने surgery मे जितनी प्रगति की है , उसे सन्तोष जनक कहा जा स्कता है / लेकिन रीढ की बीमारियों का इलाज सर्जरी द्वारा करा डालने से इसमे एक बाधा यह है कि मरीज को पहले से ज्यादा हर बात मे सतर्कता बरतनी पड़्ती है जैसे चलने , बैठने , मुड़्ने, घूमने , लेटने आदि जैसे कार्य भी बहुत धीमे और चेतावनी के साथ करने होते हैं /

जरा सी भी लापरवाही और कोताही शरीर को तकलीफ देने लगती हैं / बहुत से ऐसे मरीज भी अक्सर देखने मे आये है जो हमेशा बिस्तर पर ही पड़े रहते है और करवट बदलने के लिये उनको दूसरों से सहायता लेनी पड़्ती है / दैनिक काम भी बिना किसी दूसरों की सहायता के नही किये जा सकते है /

रीढ की हड्डी के पान्च हिस्से होते है / इन्हे (१} सरवाइकल (२) थोरेसिक (३) लम्बर (४) सैक्रल और (५) काक्सीजियल हिस्सो के नाम से जाना जाता है / रीढ के किसी भी हिस्से मे तकलीफ हो सकती है /

इसमे ”एन्काइलोसिन्ग स्पान्डिलाइटिस” नाम की ऐसी बीमारी है जो रीढ की हड्डी की पुरी की पूरी ही इन्फ्लेम्ड हो जाती है यानी रीढ की हड्डी मे दाह अथवा प्रदाह अथवा सूजन अथवा शोथ पैदा हो जाती है जिसके कारण शरीर जकड़ जाता है , शरीर को मुड़ने मे या इधर उधर या दाये बायें घुमाने मे या चलने फिरने मे या किसी भी मूवमेन्ट मे दर्द और अकड़न और जकड़न हो जाती है जिसके परिणान स्वरूप शरीर कुछ कर नही पाता और असहाय की स्तिथि पैदा हो जाती है /

रीढ शरीर का केन्द्रीय अन्ग है और इसके बीमार या अस्वस्थ होने का मतलब है कि शरीर बिल्कुल काम करने लायक नही रह जायगा / इसकी गुरियों अथवा वेर्टेब्रा VERTEBRA  के जोड़ो से नस और नाड़िया निकल्ती है जो शरीर के अन्गो को कन्ट्रोल करती है , जिस हिस्से से यह सिग्नल कम होन्गे या अधिक होन्गे वही अन्ग अधिक या कम काम करने लगते है / ऊपर के दिये गये चित्र  से  यह देखकर समझा जा सकत है कि रीढ का कितना महत्व है और इसमे हो रही किसि भी तकलीफ की अनदेखी नही करना चाहिये /

ऊपर दिये गये माडल  को देखिये और जैसा कि बताया गया है कि रीढ की हड्डी किस तरह से अनाटामी के हिसाब से शरीर मे उपस्तिथि होती है/ HIP BONES   यानी कमर की हड्डी भी इससे जुड़्ती है और कमर की किसी भी रीजन यथा लम्बर अथवा सैक्रल अथवा काक्सीजियल भाग मे कोई तकलीफ होगी तो वह हिस्सा बीमार होकर कोई गम्भीर रोग का आगाज कर सकती है जिनमे AVASCULAR  NECROSIS एवैस्कुलर नेक्रोसिस जैसी बीमारी पैदा हो सकती है / यह वही बीमारी है जिसमे कूल्हे की हड्डी बदलनी पड़्ती है या पूरा कमर की हड्डी ही बदल दी जाती है /

रीढ की हड्डियो की तकलीफो का बहुत बढिया इलाज आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विधियो मे है / आदि काल से आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विधियो से ऐसी रीढ की हड्डियो की बीमारियों का इलाज सफलतापूर्वक  किया जाता रहा है / आयुर्वेद की अन्य शारीरिक आराम पहुचाने वाली विधियों से भी यथा पन्च कर्म अथवा तैलादि कर्म अथवा वाष्प कर्म आदि आदि विधियो के applications  द्वारा रीढ की हड्डियो का इलाज किया जाता रहा है और अभी भी वही क्रम चालू है / लेकिन जागरुकता लोगो के बीच मे न होने के कारण या बीमारियो के सही इलाज कैसे किया जाय और किस विधि से किया जाय इसके बारे मे जानकारी न होने के कारण लोग पहले गलती करते है और फिर सारा जीवन बिस्तर पर ही गुजार देते है / ऐसा मेरा प्रैक्टिकल अनुभव है /

 

एन्काइलोसिन्ग स्पान्डिलाइटिस सेप ीडित मरीज की पीठ पर हो गयी छोटी छोटी फुन्सियां /

रीढ की हड्डी का रोगी , जिसे एन्काइलोजिन्ग स्पान्डिलाइटिस हो गयी है , लगभग एक साल के इलाज से अब ठीक है /

जैसा कि मै हमेशा कहता हू कि अग्र कोई बीमारी किसी डाक्टर द्वारा ऐसे बता दिया गया हो कि यह ला-इलाज है . तो यह मानकर चलना चाहिये कि हो सकता है यह बीमारी जो डाक्टर साहब बता रहे है भले ही उनके सिस्स्टम मे , जिसमे वह प्रैक्टीस कर रहे हो , उसमे लाइलाज हो , लेकिन यही लाइलाज बीमारी दूसरे सिस्टम मे इलाज करने से ठीक हो सकती है , ऐसा लोगो को  विचार  करना होगा / उदाहरण के लिये यदि पित्त की थैली मे अगर ६ मिलीमीटर से अधिक की पथरी हो तो उसका एक मात्र इलाज सरजिकल आपरेशन ही है , इसका कारण यह है कि पित्त-नली का अन्दर का डायमीटर ६ से लेकर ८ मिलीमीटर तक होता है / ६ मिलीमीटर की पित्त की थैली की पथरी इसीलिये नही निकल पायेगी क्योन्कि पित्त की नली का डायमीटर उतने ही साइज का है , इसलिये पथरी सरक नही पायेगी और नली मे ही फन्स जायेगी , इसलिये दवा से यह काम नही होगा और SURGICAL OPERATION ही एक मात्र उपचार है /

अगर इसी पित्त की थैली मे छॊटी पथरी हो तो आयुर्वेद और आयुष इलाज से यह पिघल कर और साइज मे छोटी होकर निकलने के chances  होते है /

इसलिये सभी लोगो को विचार करना चाहिये कि बीमारी के इलाज के लिये उनके पास विकल्प मौजूद है तो यह अव्श्य आजमाना चाहिये /

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