महीना: जुलाई 2017

MUSCULAR DYSTROPHY CASE; AYURVEDA DIAGNOSIS BASES COMBINATION / INTEGRATED AYUSH TREATMENT AND MANAGEMENT RELIEVED AND COMFORTED PHYSICALLY AND MENTALY PATIENT HEALTH CONDITION ; मस्कुलर डिस्ट्राफी का एक केस ; आयुर्वेद की डायगनोसिस और आयुष के मिलेजुले इलाज के द्वारा मरीज को मानसिक और शारीरिक दोनो ही तरह से आराम मिला


३० साल के एक पुरुष मरीज , जिसे मस्कुलर डिस्ट्राफी MUSCULAR DYSTROPHY  का रोग कई साल पहले हुआ था जिसके कारण मरीज चल फिर नही सकता था और मरीज को कई लोग सहारा देकर उठाते बैठाते थे / एलोपैथी के डाक्टरो ने इस बीमारी को लाइलाज बता दिया था / एलोपैथी का इलाज कराने के साथ साथ इसकी हालत बिगड़्ती चली जा रही थी /

यह मरीज मेरे यहा पिछले साल सितम्बर २०१६ को इलाज के लिये हमारे केन्द्र मे ३५० किलोमीटर दूर से आया था / इसे कई लोग सहारा देकर और हाथो मे उठाकर examination table पर लिटाने की स्तिथि मे आया था / यह मरीज अपने पैरो पर चल फिर नही सकता था और बिना सहारे के चल फिर भी नही सकता था /

MUSCULAR DYSTROPHY मस्कुलर डिस्ट्राफी एक ऐसी बीमारी है जिसमे शरीर की सभी मान्शपेशियां मोटी होने लगती है और भारी होने लगती है / किसी किसी को हाथ और पैर की मान्शपेशियां मोटी होती है जो बेडौल दिखायी देती है / मान्शपेशिया मोटी हो जाने के कारण रोगी को उठने बैठने मे बहुत परेशानी होती है और चल फिर नही पाता है यहा तक कि अपने दैनिक काम भी नही कर पाता है /

उक्त रोगी जब पहली बात हमारे केन्द्र मे चिकित्सा के लिये आया था तो इसे कई लोग हाथो मे टान्गकर  टेस्ट करने वाली कोच पर लेकर आये थे / यह रोगी पिछले आठ महीने से इलाज कर रहा है /

आठ अम्हीने के इलाज से इसको यह आराम मिली है कि यह चल फिर लेता है और पना दैनिक काम कर लेता है  / इसके हाथ बहुत मोटे हो गये थे जो इलाज के बाद अपने समान्य आकार मे आने लगे है /

मरीज कॊ काफ मान्शपेशी मे अधिक सूजन होने के कारण यह चलने मे जयादा दूर तक नही जा पाता है /

यह एक तरह की लाइलाज बीमारी है और इसका कोई इलाज नही है यह बात सही है लेकिन आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन और मरीज के रक्त परीक्षण से प्राप्त रिपोर्टो को समजह्ने के बाद मिली हुयी कमियो को जब जड़ मूल से इलाज करते है तो ऐसी बीमारिया मे जरूर आराम मिलती है /

ऊपर की  आयुर्वेद की रक्त परीक्षण रिपोर्ट से पता चला कि इसे ”वात-कफ” दोश है और सप्त धातुओ मे मान्स और मेद धातु की विकृति है / इस रोगी को दोष और धातु सुधार के लिये आयुर्वेदिक औषधियो को सेवन करने के लिये बताया गया और िलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स को कमी को दूर करने के लिये कया करना चाहिये यह सब बताया गया /

इस तरह के मैनेज्मेन्ट करने से ”लाइलाज”बता दी गयी बीमारियो के इलाज और मरीजो के मैनेजम्न्ट को  एडजस्ट करने  से ही लाइलाज कही जाने वाली बीमारियो का इलाज किया जा स्कता है / हमे यह कहने मे कतई सन्कोच नही है कि लाइलाज बता दी गयी बीमारियो का इलाज आयुर्वेदास्कैन और रक्त परीक्षण की फाइन्डिन्ग्स द्वारा सम्भव हो सकता है  /

 

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भारतीय परिवारो मे दो तत्वों की कमी लैबोरेटरी टेस्ट मे ज्यादा मिलती है ? पहला आयरन और दूसरा कैलसियम ; आयुर्वेद की मन्डूर / काशीश भस्म और मुक्ता शुक्ति / शन्ख / कौड़ी भस्म से यह कमी ठीक हो जाती है /


विगत कई वर्षों से मरीजो का रक्त परीक्षण हमारे यहा सभी आने वाले मरीजो का किया जाता है / Blood Test रोगी की बीमारी के हिसाब से भी किया जाता है और जब गम्भीर बीमारियो के मरीज होते है तो उनके अधिक से अधिक serological tests और chemical chemistry के टेस्ट किये जाते है / इसके पीछे यह मान्यता है कि रोगी की बीमारी की प्रोग्रेस कितनी हो रही है और कैसी है यह पता चल सके /

परीक्षण के लिये हमारे रिसर्च केन्द्र मे केवल मरीजो के लिये [हमारे यहा स्थापित लैबोरेटरी मे हमारे मरीजो के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति का किसी तरह का परीक्षण नही किया जाता है, यह बेहद स्ट्रिक्ट रूल है] पैथोलाजिकल परीक्षण के लिये लैबोरेटरी स्थापित की गयी है जिसमे केमिकल केमिस्ट्री के अलावा आयुर्वेद के अनुसन्धान के लिये रक्त परीक्षण आयुर्वेद के मौलिक सिध्धन्तो को जानने के लिये किये जाते है /

इन परीक्षणो मे कुछ रक्त के परीक्षण ऐसे है जो अधिकान्श मरीजो मे असामान्य पाये गये है / इस तरह के असामान्य पाये जाने वाले परीक्षणो मे तीन परीक्षण की पहचान की गयी है /

१- Hemoglobin percentage

2- Erythrocytes sedimentation rates

3- Serum Calcium

हीमोग्लोबिन परीक्षण करने मे लगभग ६० प्रतिशत लोगो का सही मिला / इनमे से कुछ ऐसे भी है जिनका पर्सेन्टेज सामान्य लिमिट से अधिक प्राप्त है, ऐसा भी देखने मे आया, लेकिन ४० प्रतिशत लोगो का सामान्य से कम यानी बार्डर लाइन से नीचे मिला है /

इसी तरह Erythrocyte sedimentation rate भी लगभग ५० प्रतिशत लोगो मे निर्धारित मानक ० से १० / २० मिलीमीटर से अधिक मिला है / इसका मतलब है कि लगभग ५० प्रतिशत लोग किसी न किसी इन्फ्लेमेटरी डिसाआर्डर INFLAMMATORY DISORDER से जूझ रहे है /

Serum Calcium रक्त मे ९ से ११ मिलीग्राम होना चाहिये / लेकिन ५० से अधिक लोगो मे यह प्रतिशत या तो कम है या फिर अधिक की ओर है /

मैने ऐसी स्तिथि को ठीक करने के लिये आयुर्वेद का निम्न फारमूला पीड़ित रोगियो को सेवन करने के लिये सजेस्ट किया है /

१- मन्डूर भस्म / काशीश भस्म १०० मिलीग्राम
२- मुक्ता शुक्ति भस्म १०० मिली ग्राम
३- शन्ख भस्म १०० मिली ग्राम
४- कौड़ी भस्म १०० मिलीग्राम

ऊपर की सभी आयुर्वेदिक दवायें ४०० मिलीग्राम की आपस मे मिलाने पर हो जाती है /

इसे बनाने का तरीकायह है कि किसी खरल मे सभी दवाओ को बराबर मात्रा मे लेकर आपस मे अच्छी तरह से मिला लें / इसके बराबर इसी मिश्रण में शक्कर मिला लें / शक्कर मिली दवा कुल 800 milligram बनेगी / इसे आधा करके दो खुराके बना ले / अधिक खुराके बनाने के लिये इसी रेशियो मे मूल दवायें और शक्कर मिलाकर जितनी खुराके बनाना चाहे , बनाकर उपयोग कर सकते हैं /

यह मिश्रण 400 मिली ग्राम की मात्रा मे भोजन के बाद यानी लन्च और डिनर के बाद सादे पानी से खाना चाहिये /

कैल्सियम का तत्व हमारे भोजन मे मिला हुआ होता है / भोजन जब पेट की थैली मे जाता है तो वहा मौजूद एसिड खाये गये पदार्थ यानी भोजन को चाइम मे बदल देता है जैसे हीयह चाइम छोटी आन्त के पहले ्हिस्से मे जाता है चोटी आन्त कैल्सियम का चूषण कर लेती है और रक्त मे मिला देती है / इसे मेटाबालिक प्रक्रिया कहते है /

लेकिन जब इस प्रक्रिया मे बाधा पैदा हो जाती है तब कैल्सियम का चूषण आन्तो द्वारा ठीक से नही हो पाता है और तब कैल्सियम की कमी होने लगती है अथवा इसका लेवल बढने लगता है /

इसी तरह रक्त के सेलो मे आयरन की मात्रा कम होने लगती है जिससे रक्त की आक्सी-हीमोग्लोबिन की क्रिया सामान्य रूप मे सम्पादित नही हो पाती है / जिससे हॊमोग्लोबिन टेस्ट करने मे कम बताता है /

आयुर्वेद की उक्त औषधियां फार्मोकोलाजिकल एक्शन  के हिसाब से शरीर मे नीचे बतायी जा रही फीजियोलाजिकल प्रक्रिया से अवशोषित हो जाती है /

मोती यानी PEARL  जिस कवच के अन्दर पैदा होता है उसे मुक्ता शुक्ति के नाम से आयुर्वेद मे पहचाना जाता है / इसकी भस्म बनाने का एक विशेष तरीका है / इसे इस तरह से समझे कि इसको आग मे पूरी तरह और अच्छी तरह से जला डालते हैं यानी इस मोती के कवच को जलाकर राख मे बदल देते है / यानी इसका complete carbonation कर देते है / आयुर्वेद मे इसे भस्मीकरण की क्रिया कहते हैं / अपको पता होना चाहिये कि मोती की सीप के कवच मे वही सारे तत्व और केमिकल पाये जाते है जहां यह जिस समुद्र मे पायी जाती है / समुद्र के पानी मे जिस तरह के तत्व होन्गे वह सब इसमे मिलते है यानी आयोडीन, पोटैसियम, कैल्सियम तथा अन्य दूसरे तत्व जो भस्मी करण के बाद भी अटामिक आयन्स के रूप मे मौजूद रहते हैं / यही मन्डूर और काशीश भस्म का भी है / यह भी और इन सबके मालीक्यूल्स का एटामिक स्ट्रक्चर कभी भी नही बदलता चाहे इन सब तत्वों का कितना ही भस्मीकरण क्यों न किया जाये / इन भस्मों मे मूल तत्व के एटामिक तत्व मौजूद रहते है /

भोजन के साथ जब इन सबका intake  किया जाता है तो यह सभी भास्मीकृत तत्व भोजन के साथ मिल जाते है और भोजन का एक पार्ट बन जाते है / जब पाचक केमिकल और एन्जाइम्स इन सभी पर एक्शन करते है तो यह अलग अलग segregate  होकर छोटी आन्तों के कई हिस्सों से अवशोषित हो जाते है और रक्त मे मिल जाते है /

आयुर्वेद की यह औषधियां सस्ती और गुणकारी है / इसे सभी उम्र के लोग सेवन कर सकते है / इन औषधियो के किसी तरह के साइड प्रभाव नही है और यदि सरकार चाहे तो इसे देश के सभी नागरिको को मुफ्त मे बान्ट सकती है /

इस फार्मूले से ESR और  Hemoglobin और  Calcium deficiency इन सबकी रोकथाम एक साथ हो जाती है /

भारत सरकार के आयुष मन्त्रालय को इस ओर ध्यान देना चाहिये /