दिन: फ़रवरी 23, 2019

Seizures An Acute Emergent condition ; अचानक बेहोश हो जाना और सुध बुध खोना


दिमाग के अन्दर और अन्दरूनी हिस्से से उठनें वाली अचानक हल-चल या उत्तेजित कार्य कलापों की वजह से अचानक बेहोश हो जाना या सुध-बुध खोकर खब्तुल हवासी या होशो-हवाश खोने की हालत हो जाना जैसे हालात हों तो इसे सीजर कहते हैं

उत्तेजित दिमाग की अ-समानुपातिक कार्य करने की वजह से अनचाहे शारीरिक भाव-भंगिमायें जैसे हाथ या पैर या मुख या गर्दन या पीठ का कठोरता के साथ मुड़ना या ऐंठना और इसके साथ बेहोश हो जाना और दांत का कस कर बन्द कर लेना, जिसके कारण जीभ का कट जाना, मुख से गाढ़े थूक का निकलना, पाखाना या पेशाब का अनियंत्रित होकर निकलना आदि लक्षण देखनें में आते हैं

जैसा कि बताया जा चुका है कि बेहोशी का होना दिमाग यानी मष्तिष्क अथवा यह कहा जाय कि सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम से संबंधित बीमारी है और यह सिस्टम बीमारी के मूल में कारक है, लिहाजा वह क्या कारण हो सकते हैं जो ऐसी बीमारी पैदा होती है

अगर बहुत तेज बुखार किसी को होता है तो शरीर में बुखार की तेज गरमी या तापमान का अधिक बढ़नें का दबाव शरीर नही बर्दाश्त कर पाता है जिसके कारण बेहोशी की स्थिति बन जती है, इसे फेब्राइल सीजर कहते हैं,

बेहोशी इन्फेक्शन से भी होती है , इन्फेक्शन के कारण होने वाली बेहोशी अघिकतर कई तरह के मिक्सड यानी मिले जुले इन्फेक्शन के शरीर में पड़नें वाले प्रभाव से होती है

अगर मलेरिया का इन्फेक्शन सीवियर स्तर तक पहुंच जाय और इलाज करनें में  लापरवाही की जाय तो बेहोशी की तकलीफ पैदा हो जाती है

मेनिन्जाइटिस यानी दिमागी बुखार हो जाये तो बेहोशी की बीमारी पैदा हो जाती है , यह मेनिन्गो कोक्कल बैक्टीरया के इन्फेक्शन के कारण होता है 

इसी से संबंघित एक बीमारी दूसरी होती है , इसे मेनिन्गो-इन्सेफेलाइटिस कहते हैं , यह होने पर बेहोशी की बीमारी पैदा हो जाती है, दिमाग में सूजन आ जाने के कारण ऐसी समस्या होती है, ऐसा बैक्टीरिया के कारण होता है 

सेरेब्रल टाक्सोप्लाज्मोसिस Cerebral toxoplasmosis एक तरह से दिमागी बुखार की तरह के सिंड्रोंम्स वाली बीमारी है और इसमें सभी लक्षण मेनिन्जाइटिस जैसे पाये जाते हैं , एड्स अथवा एच.आई.वी. की बीमारी के कारण सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम यानी दिमाग पर इन्फेक्शन का असर पड़ता है लेकिन ऐसा असर हमेंशा एड्स की बीमारी के अन्तिम अवस्था में ही देखनें में आता है

सिस्टीसेरकोसिस बीमारी सुअर का गोश्त सेवन करनें वालों को या सुअर के सम्पर्क में रहनें वालों को ही होनें की अधिक संभावना होती है , पोर्क टेपवर्म, टीनिया सोलियम के लार्वा द्वारा इन्फेक्शन होनें से यह लार्वा दिमाग में पहुंच जाते हैं और सीजर की बीमारी पैदा करते हैं . जानवरों के द्वारा फैलाये गये इन्फेक्शन से मनुष्यों में यह बीमारी पैदा होती है        

मेटाबालिक कारण Metabolic causes से भी सीजर या बेहोशी की बीमारी हो जाती है , लेकिन ऐसी अवस्था उनको ही होती है जिनको रक्त में सूगर कम होनें की बीमारी अचानक हो जाती है . इसके अलावा जिनको हाइपोग्लाइसीमिया Hypoglycaemia की तकलीफ होती है , उनको अचानक बेहोशी की बीमारी पैदा हो जाती है

इयाटरोजेनक कारण Iatrogenic causes से भी बेहोशी की बीमारी पैदा हो जाती है, अगर कोई बेहोशी को दूर करनें के लिये दवा का सेवन लगातार कर रहा है और वह रोगी दवा को अचानक बन्द कर देता है तो दवा बन्द करते ही बेहोशी होने लगती है

इपीलेप्सी यानी मिर्गी और हिस्टीरिया यानी अपस्मार इन दोनों बीमारियों में बेहोशी या सीजर आ जाते हैं  

इक्लैंम्प्सिया , महिलाओं में गर्भावस्था होनें के दरमियान बेहोशी की बीमारी पैदा हो जाती है , यह नर्वस सिस्टम के दबाव के कारण होता है

यहां संदर्भित और वर्णित की गयी सभी बीमारी ठीक हो जाती हैं, अगर इनका इलाज शुरूआत की अवस्था और बीमारी की पहली और दूसरी अवस्था में ही पूरी शिद्दत के साथ बिना किसी लापरवाही के और बिना समय गंवाये किया जाये

आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी दवाओं के सम्मिलित और इन्टीग्रेटेड उपचार और औषधि व्यवस्था के अलावा खान-पान और जीवन शैली के बदलाव और अन्य वैकल्पिक साधनों को अपना कर इलाज करनें से बतायी गयी बीमारियों में अवश्य लाभ होता है





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अचानक होनें वाली अप्रत्यासित बीमारियां CLINICALLY OBSERVED SHOCKED CONDITION


अचानक होनें वाली बीमारियां और इन सब बीमारियों से प्रभावित लोगों को यह समझनें की जरूरत है कि क्लीनिकल शाक्ड कंडीशन ऐसी अवस्था है जो किसी भी पुरानी तकलीफ के घीरे धीरे बढ़ते हुये

और इस धीरे धीरे बढ़ाव को बिना किसी तकलीफ का अहसास कराते हुये अचानक एक दिन विस्फोटक स्वरूप में प्रकट होकर शरीर को गंभीर हालत में ला देने की स्थिति है

जब शाक की स्थिति पैदा होती है तो इस बात की संभावना सबसे अधिक होती है कि एक्यूट सर्कुलेटरी सिस्टम कहीं फेल न होनें लगे ।

ऐसा देखा गया है कि अगर शीघ्र ही प्रारंभिक निदान और उचित उपचार नही किया गया तो शाक की तकलीफ की मृत्यु दर अधिक होती है।

शाक की कुछ स्थितियां होती हैं ।

  1. हाइपोवोलेमिक शाक
  2.  सेप्टिक शाक
  3. कार्डियोजेनिक शाक

हाइपोवोलेमिक शाक दो भागों में बट जाता है ।

  1. एब्सोल्यूट हाइपोवोलेमिया – यह स्थिति तब पैदा होती है जब इंट्रावैस्कुलर फ्लूड क्षीण हो जाता है यानी नसों के अन्दर बहनें वाला रक्त-सिरम में कोई कमी हो  जाय ।

उदाहरण के लिये – खून का किसी बाहरी या आन्तरिक कारण से अत्यधिक मात्रा में  बह जाना, डिहाइड्रेसन, शरीर से अत्यधिक मात्रा में पानी की कमी हो जाना, आग से जल जाना

और

  • रिलेटिव हाइपोवोलेमिया – एनाफिलैक्टिक रियक्शन, किसी वजह से एलर्जी पैदा हो जाना, विषैली दवाओं का उपयोग, एन्टीबायोटिक का अत्यधिक  प्रयोग, मलेरिया और कैंसर जैसे असाध्य रोगों की श्रेणी

सेप्टिक शाक – इसमें कई रोग एक साथ जुड़कर शरीर की स्थिति नाजुक बना देते हैं जैसे किडनी फेल होने के साथ साथ दमा की बीमारी और ढायबिटीज रोग का एक साथ पैदा हो जाना

कार्डियोजेनिक शाक – हृदय और हृदय रोग के विभिन्न प्रकारों से ग्रसित रोगी, जहरीले पदार्थों का हृदय की गतिविधियों पर असर, गंभीर किस्म की प्राणलेवा चोट

शाक के सामान्य लक्षणः

शरीर का पीला दिखाई देना, Mottled  Skin, हाथ पैर ठन्डे हो जाना, पसीना अधिक आना, प्यास का अघिक लगना, हृदय की घड़कन का अघिक चलना, कम ब्लड प्रेशर, सांस लेने में तकलीफ, शरीर का नीला पड़ना, पेशाब का बंद हो जाना, दिमाग में भ्रम पैदा होना

जैसे ही शाक से ग्रसित रोगी में इस तरह के लक्षण दिखाई दे, तीमरदारों को सावघान हो जाना चाहिये और स्थिति को समझते हुये अस्पताल या चिकित्सक की सलाह लेना चाहिये ।

शाक की कुछ स्थितियां घर पर ही मैनेज की जा सकती हैं लेकिन यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है । बहुत सी स्थितियों में चिकित्सक को रोगी के रोग को मैनेज करनें के लिये विशेष सुविधाओं की आवश्यकता होती है जो केवल अस्पताल में ही संभव है ।

ऐसी स्थिति जीवन में न आये इसके लिये लोगों की जागरूकता और कोई भी बीमारी होनें पर समयानुकूल तुरन्त इलाज करनें का इरादा हो तो ऐसी परिस्तिथियों से बचा जा सकता है ।

बहुत सी स्थितियों पर आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी दवाओं द्वारा तुरत फुरत इमरजेंसी लाइन के तौर पर इलाज शुरू कर दिया जा सकता है और घर अथवा क्लीनिक में ही इलाज की व्यवस्था की जा सकती है ।







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औषधियां सामान्यतया टाक्सिक यानी विषैले प्रभाव वाली होती है


मानव शरीर में जब किसी तरह का रोग होता है , तब उसको दूर करनें के लिये औषधियों का सहारा लिया जाता है ।

आम तौर पर यह दवायें वनस्पतियों और केमिकल या रासायनिक पदार्थों अथवा जीव-जन्तुओं के अंगों से प्राप्त की जाती हैं । प्राप्त किये गये द्रव्यों से फार्माकोपिया के अनुसार दवाओं का निर्माण करते हैं

दवाओं का उपयोग रोग के अनुसार और पूर्व प्राप्त अनुभव और ग्यान के अनुसार करते हैं, जैसा कि चिकित्सा के ग्रन्थों में बताया गया है । रोगी की बीमारी के अनुसार डाक्टर अथवा चिकित्सक दवाओं का चयन या यह चुनाव करते हैं कि कौन सी दवा रोगी के रोग के हिसाब से फ़ायदेमंद साबित होगी

यह जान लेना जरूरी है कि दवायें सामान्य भोजन की तरह की वस्तु नही होती है । औषधियां सामान्यतया टाक्सिक यानी विषैले प्रभाव वाली होती है और यह रोज़मर्रा के खानें में उपयोग की वस्तु नही होती है

कुछ अपवाद छोड़कर जिसमें ऐसी वस्तुयें हैं जो खानें में भी काम आती हैं और दवाओं में भी । उदाहरण के लिये केसर , जायफल, जावत्री, अदरख, हरड़, लौंग, इलायची, काली मिर्च, पीपल, हल्दी आदि आदि

जितनी भी दवायें होती हैं वे सभी केमिकल से युक्त होती है । मिनरल्स से बनी दवायें स्वयं केमिकल होती हैं क्योंकि यह इसी ओरीजनल स्वरूप में पायी जाती हैं । वनस्पतियों से प्राप्त दवायें फ़ाइटो-केमिकल कही जाती है । जीव-जन्तुओं से प्राप्त दवाओं को बायो-केमिकल कहते हैं ।

सभी तरह के जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट और फैट और मिनरल्स- विटामिन और पानी जैसे तत्व पाये जाते हैं ।

इनमें कुछ खास किस्म के ऐसे विषम तत्व अथवा पदार्थ पैदा हो जाते हैं जो मानव शरीर के अनुकूल नही होते हैं ।

उदाहरण के लिये घास एक तरह का चारा है जो जानवरों के लिये अनुकूल है लेकिन मानव इसे नही खाता क्योंकि यह मनुष्य के लिये प्रतिकूल असर वाला पदार्थ है ।

इसी तरह बहुत से जहरीले जानवर दूसरे जानवरों व्दारा खा लिये जाते है, लेकिन इस जहर का असर खाने वाले जानवर पर नही होता है ।

तात्पर्य यह है कि इन्हीं टाक्सिक मैटेरियल के असर शरीर में पड़ते हैं, जो पूरे शरीर में अथवा शरीर के विशेष अथवा किसी खास अंग को प्रभावित करनें की क्षमता रखते हैं ।

उदाहरण के लिये पोटैसियम सायनायड एक सबसे तेज असर करनें वाला जहर है । कहते हैं कि इसका स्वाद आज तक कोई बता नही पाया है ।
जीभ पर रखते ही फ्रैक्सन आँफ सेकेन्डस में मृत्यु हो जाती है ।

लेकिन पोटैसियम सायनायड से बनाई गयी होम्योपैथिक फार्माकोपिया के अनुसार पोटेन्टाइज्ड तरीके से बनाई गयी होम्योपैथिक दवा पोटैसियम सायनाइड 30 या अधिक शक्ति के उपयोग करनें से जीभ के कैंसर, कैंसर के दर्द, सायटिका, मिर्गी, न्यूरेल्जिया, फेफड़े के रोगों के अलावा दूसरी बीमारियों में आराम पहुंचाया जा सकता है ।

दवायें किस तरह शरीर में असर करती हैं, इसके लिये बायो-केमिस्ट्री, केमिकल केमेस्ट्री, फीजियोलाजी, फार्माकोलाजी इत्यादि विषयों के सामूहिक अध्ययन से पता करनें का प्रयास किया जा सकता है ।

शरीर में दवायें प्रवेश करनें के कुछ रूट अथवा रास्ते हैं, सामान्य तौर पर दवायें मुख के द्वारा दी जाती हैं, लेकिन इन्जेक्शन व्दारा और त्वचा के व्दारा और नाक के व्दारा भी दवायें शरीर की जरूरत के अनुसार प्रयोग कराई जाती हैं ।

जैसा कि बताया जा चुका है कि दवाये एक तरह के टाक्सिक सब्सटेंस होते हैं, इसलिये इनके असर की तेजी सब्सटेस की टाक्सिक लेवल ओर मात्रा पर निर्भर करता है ।

उदाहरण के लिये सल्फाज की गोली का मानव शरीर पर असर किस तरह से होता है । सल्फाज टेबलेट का उपयोग कृषि उत्पाद और अनाज को कीड़ों से सुरक्षित करनें के लिये किया जाता है ।

अगर भूल-चूक से यह मानव या जानवरों के शरीर में पहुंच जाय तो उसको कोई दवा या इलाज बचा नही सकता है । यहां यह सब बतानें का उद्देश्य यही है कि टाक्सिक सब्सटेंस का हल्का और गंभीर असर के लेवल कैसे और किस तरह हैं, यह समझना है ।

औषधियों में निहित या समाहित या सम्मिलित या संग्रहित तत्व जब शरीर में पहुंचते हैं तो सबसे पहले दवाओं का पाचन होता है और तब जाकर इसके औषधीय तत्व रक्त में जाकर मिलते हैं, यह ठीक उसी तरह होता है जैसा कि भोजन पचकर इसके तत्व रक्त में मिलते हैं ।

Digestion डाइजेशन और Carbohydrate Metabolism कार्बोहाड्रेट मेटाबालिज्म और Protein Metabolism प्रोटीन मेटाबालिज्म और & Lipid Metabolism लाइपिड मेटाबालिज्म & Nucleic Acid Metabolism न्यूक्लाइक एसिड मेटाबालिज्म और & Biological Oxidation बायोलाजिकल आक्सीडेशन & Enzyme Kinetics एन्जाम काइनेटिक्स & Immunology इम्यूनोलाजी आदि

प्रक्रियायों से गुजरकर खायी गयी औषधियों के मूल तत्व रक्त में मिलते हैं और अपने विशेष प्रभाव से बीमार अंग अथवा दर्द के स्थान अथवा सारे शरीर में असर डालते हैं ।

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