लेखक: Dr.D.B.Bajpai

Born 01 SEPTEMBER 1947. Graduate in Ayurveda, Homoeopathy and Modern western medicine, Inventor of "Electro-Tridosha-Graphy" i.e. ETG Ayurvedascan and "Electro-Homoeo-graphy". Over 50 years Medical practice experience of Homoeopathy, Ayurveda, Herbal and Modern western medicine etc etc, Research and development of newly invented technology Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system is under taken still with new establishment of parameters for status quantification of the AYURVEDA PRINCIPLES and disease diagnoses for whole body in holistic views and theories of AYUSH therapies.

E.N.T.O. : Ear, Nose, Throat , Ophthalmic Disorders cure by AYURVEDA – AYUSH Treatment and management ; आन्ख, नाक, कान,गला , दान्त, मसूढे, जीभ, मुख आदि से सम्बन्धित रोग आयुर्वेद और आयुष इलाज और बताये गये परहेज से अव्श्य ठीक होते है


आन्ख, नाक, कान, मुख, दान्त, गला, जीभ, तालू आदि अन्गो से सम्बन्धित सभी रोग आयुर्वेद की चिकित्सा से अवश्य ठीक होते है /

आयुर्वेद मे ऊपर बताये गये सभी भाग अथवा अन्ग यह सभी मिलकर” त्रिक स्थान या उर्ध्व जत्रु ” कहते है / गले से ऊपर यानी THROAT PIT  यानी  गले से लेकर पूरी गर्दन  और सम्पूर्ण सिर  और सिर के पीछे रीढ की हड्डी तक का पूरा भाग जिसमे CERVICAL REGION  आता है / इसमे कुछ आयुर्वेद के ग्यानियो का मानना है कि इसके साथ दोनो हाथ भी शामिल हैं / हलान्कि सम्पूर्ण त्रिक स्थान के निर्धारण के मामले मे आयुर्वेद के विग्यानियों मे कुछ मतभेद है, लेकिन उर्धव जत्रु रोग के बारे मे जैसा आयुर्वेद मे कहा गया है , वही सब स्वीकार करते है / यानी दोनो हाथ और गले से ऊपर के सभी अन्ग जिसमे thyroid glands  भी शामिल होती है /

 

 उपरोक्त  माडल मे देखने से शरीर के आन्तरिक भागो का कैसी बनावट है यह पता

                                 चलता है / इसके अलावा उन अन्गो की बीमारियो का आन्तरिक क्या सम्बन्ध हो

                                                                   सकता है , यह भी देखकर समझा जा सकता है /      

उर्ध्व जत्रु सन्स्कृत भाषा का शब्द है जिसका आयुर्वेद के मतानुसार अर्थ है गले से ऊपर के भाग और अन्ग और इन अन्गो से सम्बन्धित रोग और रोग निदान और चिकित्सा से बोध करता है /

इसलिये यह आयुर्वेद मे व्यापक सन्दर्भ मे लिया जाता है / जैसा कि आधुनिक विग्यान भले ही सुविधा के अनुसार यह मानता हो कि शरीर के सभी अन्ग अलग अलग है और इन सभी अन्गो के सन्योजन से शरीर का निर्माण होता है इसलिये शरीर के अलग अलग अन्गो के हिसाब से अलग अलग इलाज भी होना चाहिये / यह आधुनिक चिकित्सा विग्यान की सोच है कि मानव शरीर को वह अलग अलग एक मशीन की तरह से चिकित्सकीय़ ड्रूष्टिकोण से देखता है , उदाहरण के लिये मानव शरीर को मानव शरीर न समझ कर एक तरह की मशीन समझा जाता है जैसे एक कार के अन्दर की रचना होती है उसी तरह मानव के शरीर की रचना आधुनिक चिकित्सा विग्यान के दृष्टिकोण से की गयी है / कार की पेट्रोल की टन्की को डाय्जेस्टिव सिस्टम के बराबर समझिये ,  कार के इन्जन को  मनुष्य के हृदय की तरह समझिये, पहियो को मानव के हाथ पैर समझिये, गेयर , एक्सीलेटर और ब्रेक को दिमाग का हिस्सा समझिये, स्टार्ट स्विच को मष्तिष्क का मोटीवेशन समझिये , बाहरी हिस्से को त्वचा समझिये / यह कान्सेप्ट ही मानव को एक मशीन का दर्जा देता है / आप यह तो जान्ते होन्गे कि कार जब खराब हो जाती है तब इसे कहां ले जाते है ? सभी कहेन्गे कि गेराज मे या कार बनाने वाले मिस्त्री के पास /

ठीक इसी तरह से जब मनुष्य बीमार होता है तो उसे नर्सिन्ग होम या अस्पताल ले जाते है / कार के लिये गेराज और मनुष्य के लिये नर्सिन्ग होम / कार मे जब कोई खास किस्म की गड़्बड़ी होती है तो उसे उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जिस विभाग मे उसके ठीक करने वाले जान्कार होते है / ठीक उसी तरह से इन्सान को उसी विभाग मे भेज दिया जाता है जहां खास किस्म के विशेष्ग्य डाक्टर होते हैं / अब आप समझ गये होन्गे कि इन्सान को क्यो HUMAN MACHINE कहा गया है /

लेकिन इसके ठीक उलट आयुर्वेद  मानव शरीर को एक सम्पूर्ण ईकाई की तरह समझता है / यानी शरीर एक है जिसमे बहुत से अन्ग है और सिस्टम है जो एक दूसरे के पूरक है और एक दूसरे पर आश्रित है और एक दूसरे को सपोर्ट करते है / इसलिये अगर शरीर बीमार है तो उसे एक ईकाई की तरह समझ कर रोग-निदान और तदनुसार  चिकित्सा व्यवस्था करना चाहिये / ऐसा कान्सेप्ट आयुर्वेद का है /

इसलिये अगर उर्ध्व जत्रु के रोग हो तो यह अकेले नही होते है, यह सम्मिलित होते है / उर्ध्व जत्रु के मरीजो के इलाज करने से प्राप्त जैसा अनुभव मुझे हुआ है वह मै आप्के साथ शेयर करना चाहता हूं /

१-  सानुसाइटिस बीमारी के मरीजो मे नाक की तकलीफ के अलावा दूसरे सिन्ड्रोम्स भी मिलते हैं / जैसे कि पेट न साफ होना और कब्ज बना रहना, हल्का निम्न कोटि का बुखार या हरारत , कान मे दर्द और गले मे दर्द, सारे शरीर मे दर्द और सिर दर्द , भूख का न लगना ऐसी बीमारिया साथ मे हो जाती है / किसी किसी को चक्कर आने की बीमारी हो जाती है और कोई कोई तो बेहोश तक हो जाते है जैसे कि उनको मिर्गी का दौरा पड़ गया हो /

२- चेहरे के न्यूरेल्जिक दर्द  यानी फेसियल न्यूरेल्जिया के कुछ रोगियो का इलाज करने के बाद मुझे अनुभव हुआ है कि ऐसा दर्द दान्त की तकलीफों से भी होता है / दान्त की जड़ मे दर्द न होकर यह दर्द डायस्टल एरिया यानी नर्व एन्डिन्ग तक जाता है जो चेहरे कि नर्व सप्लायी को प्रभावित करती है तथा दर्द पैदा करती है / यह दर्द न्य़ूरो-मस्कुलो होता है / इससे चेहरे की पतली मान्शपेशिया प्रभावित होती हैं / पतली मान्शपेशियो के प्रभावित होने के कारण जब ठडक या ठडि हवा या ए०सी० की हवा लगती है तो यह दर्द और अधिक बढ जाता है और बहुत भयन्कर रूप ले लेता है / चेहरे की माशपेशियो मे सूजन आने के कारण यह टीपिकल किस्म की बीमारी बन जाती है जिसे लाइलाज बता दिया जाता है / यह भले ही एलोपैथी के डाक्टरो का मत हो कियह बीमारी लाइलाज है लेकिन ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित इलाज करने से इस बीमारी से छूटकारा मिल जाता है क्योन्कि उर्ध्व जत्रु रोगो की चिकित्सा सम्मिलित होती है /

३- थायराइड का रोग भी उर्धव जत्रु रोगो की श्रेणी मे शुमार किया जाता है / इसका इलाज भी आयुर्वेद के मतानुसार करने से अवश्य सामान्य अवस्था मे बना रह्ता है /

इसी तरह आन्ख और कान के ऐसे बहुत से रोग है जिनका इलाज आयुर्वेद मे सम्भव है लेकिन व्यापक जागरुकता न होने के कारण लोग बीमारियो को लाइलाज समझ लेते है और इस तरह से जो बीमारी ठीक हो सकती है उसको भी अग्यानता के कारण इलाज न कर पाने से जीवन भर भोगते है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण के अलावा अन्य परीक्षणो से प्राप्त रिपोर्ट्स के निष्कर्ष से आधारित आयुर्वेद -आयुष के काम्बीनेशन और इन्टीग्रेटेड इलाज से ऐसी सभी बीमारियों मे आराम मिलता है जिन्हे लाइलाज बता दिया गया हो /

 

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FISTULA CURABLE WITHOUT OPERATION BY AYURVEDA AND AYUSH COMBINED TREATMENT AND MANAGEMENT ; फिस्टुला / फिश्चुला / भगन्दर आयुर्वेद और आयुष इलाज से भी ठीक होता है


फिश्चुला / फिस्टुला / भगन्दर / RECTAL FISTULA की बीमारी आयुर्वेद और आयुष इलाज से ठीक हो सकती है और वह भी बिना आप्रेशन कराये / बड़ी सन्ख्या मे भगन्दर के रोगियो का इलाज करने के बाद मुझे जिस तरह का अनुभव हुआ है , वह आप सभी से शेयर करना चाहता हूं /

१- फिस्चुला जिस तरह की बीमारी है , उसे साधारण किस्म की आम बीमारियो जैसा नही समझा जाना चाहिये , यह एक तरह की अति गम्भीर किस्म की बीमारी है और इसका इलाज सन्जीदगी के साथ और गम्भीरता के साथ करना चाहिये / इसे हल्के मे नही लेना चाहिये / ऐसा मेरे अनुभव मे आया है जैसा कि मरीजो के रोग इतिहास से पता चला कि मरीज भगन्दर की बीमारी को बहुत हल्के मे लेते चले गये और बाद मे यह बीमारी बहुत खतर्नाक स्तर तक पहुन्च गयी / इसलिये इलाज करने मे देरी अथवा लापरवाही ऐसे मरीजो को बहुत भारी पड़ी है /

इसलिये रोगी को जिसको भगन्दर की बीमारी है जैसे ही पता चले फौरन इलाज करना शुरू कर देना चाहिये /

२- आम तौर पर देश और विदेश की जनता यानी GENERAL Public को पता नही होता है कि भगन्दर जैसी बीमारियों में किस तरह का इलाज किया जाय / क्योन्कि सही चिकित्सा और सही रोग निदान और सही दवाओ के द्वारा ही इस बीमारी से छुटकारा पाया जा सकता है / इसलिये सही चिकित्सा का चयन करना जरूरी होता है / आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी चिकित्सा के साथ साथ प्राकृतिक और योग चिकित्सा के कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेड इलाज के द्वारा fistula को ठीक किया जा स्कता है /

मरीजों से प्राप्त जानकारी के आधार से यह पता चला कि 99.99 percent यानी ९९.९९% रोगियों को पता ही नही है कि आयुर्वेद या होम्योपैथी अथवा यूनानी या योग चिकित्सा द्वारा इस बीमारी का इलाज किया जाता है / कहने का मतलब यह को प्रति १००० व्यक्ति मे से केवल एक को ही इस बात का पता है कि आयुर्वेद या होम्योपैथी या यूनानी या प्राकृतिक चिकित्सा मे इस रोग को ठीक करने का मुकम्म्ल इलाज है /

जानकारी का अभाव केवल जनता यानी public मे ही नही है , बहुत से DOCTORS यानी इलाज करने वाले चिकित्सको को ही नही पता है कि वे जिस बीमारी को लाइलाज बताये दे रहे है उसका इलाज भले ही उनके चिकित्सा विग्यान मे न हो लेकिन आयुष चिकित्सा विग्यान मे मौजूद है / ऐसे डाक्टर रोगी को आप्रेशन OPERATION कराने की सलाह देते है /

३- सर्जरी / OPERATION आपरेशन कराने के बाद भी बहुत से मरीजों का फिष्चुला नही ठीक हुआ है / ऐसे रोगी बड़ी सन्ख्या मे आये है जिन्होने एक बार और दो बार और कई बार से लेकर १० या ११ बार आपरेशन करा चुके थे लेकिन उनका फिस्चुला नही ठीक हुआ और उनको आपरेशन कराने के बाद भी फिस्चुला फिर से  हो गया वह भी पहले से ज्यादा, इस्से से यह पता चलता है कि भले ही दावा किया जाता हो कि आपरेशन कराने के बाद फिस्चुला ठीक हो जाता है लेकिन बड़ी सन्ख्या मे आपरेट किये गये फिस्चुला न ठीक होने और कई कई बार फिर से दुबारा हो जाने अथवा  होने की पुष्टि करता है कि आपरेशन कराने के बाद भी फिस्चुला नही ठीक होता और आपरेशन द्वारा इलाज कराने के बाद दुबारा फिर  हो जाता है , ऐसी धारणा बनती है /

मेरे यहा तीन साल पहले एक ऐसा ही मरीज आया था जिसने ११ बार फिस्चुला का आपरेशन कराया था लेकिन उसके बाद भी वह नही ठीक हुआ / यह मरीज दिल्ली के नजदीक के एक जिले का रहने वाला है इसका इलाज चल रहा है /

ऐसे आपरेशन कराये हुये और आपरेशन कराकर फिस्चुला नही ठीक होने वाले मरीजों का इलाज आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा के मिलेजुले इलाज से अवश्य ठीक हुये है /

४- क्षार सूत्र चिकित्सा आयुर्वेद विग्यान का विषय है / ऐसे बहुत से मरीज मिले जिन्होने बताया कि क्षार सूत्र चिकित्सा से उनका भगन्दर /फिस्चुला ठीक हो गया लेकिन ऐसे भी मरीज मिले जिन्होने बताया कि उन्होने क्षार सूत्र चिकित्सा की लेकिन उनको कोई भी फायदा नही मिला / यानी कहने का यह मतलब कि क्षार सूत्र की चिकित्सा से कुछ प्रतिशत फिस्चुला के रोगी ठीक हुये है / आयुर्वेद के शोधार्थियों को इस पर रिसर्च करना चाहिये और इसके परिणामो को सार्वजनिक तौर पर बताना चाहिये / ऐसा मानना है कि क्षार सूत्र पर रिसर्च की गयी होगी और इसके परिणाम भी प्रकाशित किये गये होन्गे लेकिन यह आभास होता है कि यह केवल एकाडेमिक अतर पर ही रह गया और सार्वजनिक / जन्ता के बीच इसका कोई प्रसार नही हुआ है /

हमारे केन्द्र मे ऐसे बहुत से मरीज आये है जिन्होने क्षार सूत्र चिकित्सा करायी लेकिन उनको किसी तरह का फायदा नही मिला और उनकी तकलीफ जस की तस बनी रही है / ऐसे लोगो की चिकित्सा ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन आधारित परीक्षणों  के परिणाम का अध्ध्य्यन करने के बाद कम्कीबाइन्ड / इन्टीग्रेटेद एप्रोच के साथ  आयुर्गवेदिक और होम्यीयोपैथिक और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा आधारित जीवन शैली और खान पान आधारित मैनेज्मेन्ट के द्वारा की गयी जिसके अपनाने से रोगी ठीक हुये है /

५- फिस्चुला के रोग मे डाय्जेस्टिव सिस्टम के साथ साथ इन्डोक्राइन और इन्टेगुमेन्टरी सिस्टम और लिम्केफैटिक सिस्टम के  अलावा कई तरह की ब्लड केमिस्ट्री एनोमेलीज पैदा हो जाती है / महत्व पूर्ण अन्गो की पैथो-फीजियोलाजी को समझना होता है / इसके अलावा एक बात सबसे महत्व पूर्ण है कि हर मरीज की बीमारी के समीकरण एक जैसे हमेशा नही होते है इसलिये हर मरीज का INDIVIDUALISED ANALYSIS AND STUDY  बहुत आवश्यक होती है / तभी आयुर्वेदिक दवाओ / आयुष दवाओ का चुनाव और उसके अनुसार मैनेज्मेन्ट करने से फिस्टुला की बीमारी अवश्य ठीक होती है /

हमारे रिसर्च सेन्टर मे इसी तरह से इलाज करने की व्यवस्था है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के साथ साथ अन्य दूसरे  परीक्षण करने की व्यव्स्था हमारे केन्द्र मे है / हमारे रिसर्च केन्द्र मे हमारी स्वय्म की  अपनी पैथोलाजिकल लैब है जिसमे सभी तरह के जरूरी परीक्षण करने की व्यव्स्था है / हमारा उद्देश्य रोग की जेनेसिस और उसके पाथ-वे को ढून्ढना है जहा से रोग की उतपत्ति होती है / हम इसी जेनेसिस यानी ROOT CAUSE OF DISEASE   का इलाज करते है और यही कारण है कि कई रोगो के इलाज मे हमे शत-प्रतिशत सफलता हासिल हुयी है, जो वास्तव के आश्चर्य जनक लगता है /

फिस्चुला लाइलाज बीमारी नही है और अधिकान्श्तया यह आयुष इलाज करने से ठीक हो जाती है /

 

कैन्सर के रोगियों का आयुर्वेदिक और आयुष और इन्टीग्रेटेड / काम्बीनेशन इलाज के परिणामों का अध्ध्य्यन ; STUDIES OF THE COMBINATION / INTEGRATED AYURVEDA AND AYUSH TREATMENT OF THE CANCER AFFECTED PATIENTS ;


कैन्सर के मरीजो का इलाज लम्बे समय से करते रहने से मुझे जिस तरह का अनुभव हुआ है वह सब मै आप सभी से शेयर करना चाहता हू /

बहुत बड़ी सन्ख्या मे मुझे कैन्सर के रोगियो का इलाज करने का मौका नही मिला है , लेकिन जितने भी मरीजो का इलाज किया है , भले ही उनकी सन्ख्या कम रही हो, ऐसे मरीजो की चिकित्सा करने से यह धारणा बनी है कि आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा के साथ साथ अलोपैथी के पैन किलर्स और विटामिन मिनरल्स का यदि प्रयोह साथ साथ करते है तो कैन्सर के मरीजो को दर्द और घाव और रक्त श्राव को रोकने मे बिना केमोथेरापी और बिना रेडियेशन और बिना सर्जरी के सफलतापूरवक इलाज किया जा सकता है /

लेकिन यह आसान काम नही है और इसे हल्के मे नही लेना चाहिये / कैन्सर के मरीजो के इलाज के लिये और इस तरह की चिकित्सा व्यवस्था के लिये बहुत ही skilled Doctor की जरूरत होती है जिसमे इस बात की स्पेशियलाइज समझ हो जिसे आयुर्वेद के अलावा होम्योपैथी और यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सा और इन सबके साथ एलोपैथी चिकित्सा के बारे मे स्पेशियलाइज जान्कारी और ग्यान हो / क्योन्कि दवाओ का आपस मे इन्टिग्रेट करना भी एक तरह की कला है और रोगी मे किस तरह से दवाओ का ताल्मेल बैठाना होगा और किस मात्रा मे देना होगा यह किसी समीकरण बैठाने की कला से कम नही है /

रोगी को कैन्सर की तकलीफ से हलाकि बहुत तरह के सिन्ड्रोम्स से गुजरना होता है / सब रोगियो के सिड्रोम्स अलग अलग किस्म के होते है जो उनके व्यक्तिगत कैन्सर अन्गो के प्रभावित होने के कारण से होते है / लेकिन इनमे कुछ बाते काम्न होती है जो सभी मरीजो मे पायी जाती है /

इसमे पहला सिन्ड्रोम दर्द है जो सबसे ज्यादा दुख दायी होता है / कुछ मरीजो को दर्द नही होता है ऐसा भी देखा गया है लेकिन यह दर्द बहुत भीषण होता है और दर्द से रोगी बहुत परेशान होता है / इस तरह के दर्द के मैनेज्मेन्ट मे आयुर्वेद की की दवाये कुछ सीमा तक कारगर साबित हुयी है, इनके सेवन करने से दर्द मे कमी होती है लेकिन दर्द ठीक नही होता है लेकिन दर्द की इन्टेन्सिटी लेवल कम हो जाती है और राहत बनी रहती है ऐसा अनुभव किया गया है /

दूसरा घाव अथवा व्रण का है / कैन्सर का घाव ठीक नही होता है यह सही है, इसमे सड्न और बदबू आने लगती है, क्रैक्स के कारण खून बहने लगता है जो रुकता नही है और यह बढता चला जाता है इसके रोकने के उपाय भी कम्जोर पड़ जाते है / कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेद इलाज करने से घाव का बढने की टेन्डेन्सी कम हो जाती है लेकिन यह बाहर के घावो तक ही सीमित है जहा बाहर से यानी external remedies को apply किया जा सके / घाव अगर अन्दर है तो भी सीमित स्तर की राहत हो सकती है /

तीसरा सूजन की तकलीफ होने लगती है / यह सारे शरीर मे या शरीर के कुछ हिस्सो मे हो सकती है / कैन्सर एक तरह से मेटास्टेसिस की बीमारी है जो लिम्फैटिक सिस्टम के काम करने की वजह से सारे शरीर मे फैलने की आशन्का को बढा देती है / इसलिये स्प्लीन और थाइमस ग्लैन्ड्स को सम्भालने की जरूरत होती है / आयुर्वेद मे इस सिस्टम को काबू मे रखने के लिये बहुत सी द्वाये है और इस अवस्था का इलाज समभव है /

कैन्सर के रोग का इलाज बहुत महन्गा है इसलिये इस बीमारी के इलाज के लिये धन की जरूरत होती है / साधारण दवाओ से काम न चलने पर महन्गी दवाओ की जरूरत होती है जो हर मरीज के लिये सम्भव नही होता है /

इस बीमारी से बचने का एक ही उपाय है कि स्वास्थय के बारे मे सतर्कता बरती जाय और स्वास्थय बनाये रकहने के लिये जितने उपाय है वे सभी किये जांय / कहा भी गया है कि PREVENTION IS BETTER THAN CURE यानी ऐसे स्वास्थय रक्षा के उपाय किये जाय कि यह बीमारी ही न हो /

हमारे यहा आयुर्वेद की आधुनिक तकनीक ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के परीक्षण के आधार पर कैन्सर के रोगियो का इलाज किया जाता है / जैसा कि इस तकनीक की विशेषता हि कि यह सभी सिस्टम के बारे मे किस तरह के बदलाव होते है यह पता चल जाता है और उसी के आधार पर इलाज करने से सफलता मिलती है / जैसा कि मै हमेशा कह्ता हू /

एच०आई०वी० के मरीजो मे काप्लीकेशन्स डिसआर्डर्स ; COMPLICATION DISORDERS IN H.I.V. PATIENT


एच०आई०वी० के मरीजो की बड़ी सन्ख्या मे इलाज करने के बाद मुझे जिस तरह का अनुभव मरीजो के इलाज के साथ साथ हुआ है, उसके बारे मे जिस तरह का अनुभव हुआ है वह मै सबसे शेयर करना चाहता हूं /

पहला अनुभव यह रहा है कि रोगी जितनी जल्दी चिकित्सा के लिये डाक्टर के पास आता है उसे उतनी ही जल्दी बीमारी से बचने का रास्ता मिलता है / जैसे ही यह शक हो कि उसे एच०आइ०वी० होने का खतरा है , उसे तुरन्त ही आयुर्वेदिक और आयुष या कोई भी दूसरा इलाज शुरू कर देना चाहिये / हमारे यहा ई०टी०जी आयुर्वेदास्कैन और अन्य दूसरी पथोलाजिकल जान्चे किये जाने की सुविधा है और एच०आई० वी० से सम्बन्धित वे सभी जान्च की जाती है जिनमे ब्लड और यूरिन और अन्य किसम की जान्च होती है जिन्ससे शरीर के अन्दर होने वाली एनोमेलीज का पता लगाया जा सकता है / सारा डाटा मिल जाने के बाद आयुर्वेद और आयुष का इलाज करने से प्रारम्भि अवस्था का एच०आई०वी सन्क्रमण समाप्त होता है, ऐसा मेरा मना है / हलान्कि मै मरीजो को सलाह देता हू कि वे हर चार महीने या छह महीने के अन्तराल से अपना सी डी ३ और सी डी ४ और सी डी ८ काउन्ट बराबर जान्चते रहे / इस तरह की मानिटरिन्ग करने से एच०आई०वी० का सन्क्रमण बढता नही है बल्कि शान्त अवस्था मे पड़ा रहता है और सक्रिय नही होता है /

दूसरा अनुभव यह रहा है कि ए०आर०टी० इलाज कराने के बावजूद भी बहुत से रोगी अथवा रोगुयों की स्वास्थय की हालत as it is यानी जस के तस बनी रही और उनको किसी तरह का फायदा नही हुआ / बहुत से ऐसे मरीज इलाज के लिये आये है जो १० अथवा १५ साल से ए०आर०टी० की टिकिया खा रहे थे और उनको कोई भी remarkable फायदा नही हुआ / ऐसे मरीजो के उनके सी०डी० काउन्ट भी बढते रहे अथवा घटते रहे और किसी तरह का बुनियादी परिवर्तन नही हुआ / हमारे यहा ऐसे मरीजो की सन्ख्या इलाज के लिय बड़ी सन्ख्या मे आयी है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्शन के अलावा अन्य दूसरे परीक्षण करने के उपरान्त आयुर्वेद और आयुष का इलाज किया गया उससे बड़ी सन्ख्या मे मरीजो के सी०डी० काउन्ट सामान्य स्तर पर आ गये अथवा बार्डर लाइन पर स्थापित हुये हैं / इससे यह निष्कर्ष निकाला जा स्कता है कि दिया गया इलाज एच०आई०वी० मे प्रभाव शाली है / यह जरूर है कि हमारे यहा आयुर्वेदास्कैन परीक्षण और अन्य दूसरे परीक्षण के बाद ही इलाज किये जाने की व्यव्स्था है,इसलिये जरूरी होता है कि पहले परीक्षण करके सब पता किया जाय कि किस तरह की problems और anomalies शरीर के अन्दर जन्म ले रही है / उसी अनुसार इलाज करने से H.I.V. की बीमारी पर नियन्त्रण करने का प्रयास किया जा स्कता है / बहुत से मरीजो मे सफलता मिली है लेकिन ऐसे भी मरीज है जिनमे सफलता तो नही मिली लेकिन उनकी तकलीफे बढी नही, उनके स्वास्थय मे सुधार हुआ, उनको किसी तरह की परेशानी का अनुभव नही हुआ लेकिन सी०डी० काउन्ट परीक्षण कराने मे बहुत महत्वपूर्ण बदलाव भी नही हुये है / ऐसा भी देखने मे आया है , हलान्कि यह सभी मरीज आयुर्वेद और आयुष का इलाज बाकयदा ले रहे है और अपना जीवन का कार्य सामन्य व्यक्ति की तरह से ही कर रहे है /

तीसरा अनुभव H.I.V. मरीजों के साथ यह रहा है कि जब एच०आई०वी का सन्क्रमण बढता है , यह हमेशा मरीज की लापरवाही की आदत और दवाओ के ठीक ठीक सेवन न करने और डाक्टर की राय न follow करने की वजह से होता है / ऐसे सन्क्रमण के बढने से पहला रियक्शन यह होता है कि रोगी को मलेरिया जैसा बुखार आने लगता है या टायफायड जैसा बुखार आने लगता है / यह बुखार आना इस बात का सन्केत होता है कि रोगी का इन्फेक्शन का लेवल बढ रहा है / H.I.V. CARD से टेस्ट करने पर hiv 1 – hiv2 दोनो ही positive मिलते है / ऐसे लक्षण होने पर खून की जान्च करने पर Heamoglobin का प्रतिशत सामान्य से बहुत कम और ESR का लेवल सामान्य से ज्यादा यानी दोनो ही घटे और बढे हुये मिलते है / किसी किसी रोगी को टेस्ट कराने पर typhoid या malaria या tuberculosis की बीमारी का पता चलता है और ऐसे मरीजो मे कभी कभी एच०आई०वी० पाजिटिव नही मिलता है जब्कि वे पहले से h.i.v. positive होते हैं /

ऐसे रोगियों के बारे मे मेरा मानना है और इस बात मे शक की गुन्जायश भी शामिल है कि कही यह auto-immunity का मामला तो नही बनता है ? ठीक उसी तरह से जैसे सभी डाक्टर मरीजो को देखते देखते और उनकी जान्च करते करते auto-immune हो जाते है / एक बात और है जो समझने लायक है वह यह कि जब हर साल बरसात के दिनो मे या मौसम बदलने के समय , बीमारी फैलाने वाले वायरस अपना चोला यानी आकार बदल कर कोई नये किस्म की बीमारी फैला देते है , इसलिये कही यह तो नही होता कि h.i.v. का वायरस typhoid अथवा malaria अथवा tuberculosis के वायरस या बैक्टीरिया के साथ मिल जाता हो या convert करता हो और फिर टेस्ट करने पर hiv का वायरस न पकड़ मे आने के बजाय टेस्ट में यह बताये कि tubercular infection है ? ्नतीजा बहुत confusion पैदा करता है कि मरीज को टी०बी० का इलाज किया जाये या एच०आई०वी० का / क्योन्कि अगर एच०आई० वी० का इलाज करते है या टी०बी० का इलाज करते है तो सन्शय इस बात का बना रहेगा कि मरीज को बीमारी जिसका इलाज कर रहे है वह है भी या नही है / ऐसे मे चिकित्सा कार्य सही नही हो सकता है /

चौथी बात यह अनुभव मे आयी है कि hiv के मरीजो को खून की कमी के साथ साथ serum creatinine बढने की बीमारी पैदा होती है / हीमोग्लोबिन पेर्सेन्टेज एक तरफ कम होने लगता है और दूसरी तरफ सिरम क्रियेटीनाइन बढता चला जाता है / हलाकि यह अचानक नही होता है यह धीरे धीरे बढता है और गर मरीज सावधान रहे और मुकम्म्ल इलाज करता रहे तो फिर क्रियेटीनाइन लेवल एक स्तर तक बना रह्ता है / म्रीज द्वारा की गयी एक भी साधारण सि गलती या जरा सी भी गलती उसके लिये जान लेवा साबित हो सकती है / इसलिये एच०आई० वी० के रोगी को हमेशा हर महीने हीमोग्लोबिन और क्रियेटीनाइन दोनो का परीक्षण कराते रहना चाहिये /

पान्चवी बात यह समझ मे आयी है कि hiv के रोगी को अगर डायबिटीज हो जाती है तो यह बहुत खतरनाक साबित होता है / ऐसी स्तिथि मे मरीज दिन पर दिन कम्जोर होता जाता है और उसका शारीरिक पतन होता चला जाता है /

एक बात जो सबसे महत्व पूर्ण है , वह यह कि जैसे ही मरीज को पता चले कि उसको एच०आई०वी० सन्क्रमण होने की आशन्का है , मरीज को आयुर्वेद या आयुष का इलाज बिना देर किये शुरू कर देना चाहिये / शरीर की Physiology मे pathological परिवर्तन होने से पहले अगर यह सब करते है तो इससे फायदा ही होगा / अगर इनफेक्शन नही भी है तो शरीर का detoxification हो जायेगा और अगर infection है तो सन्क्रमण का इलाज होकर शरीर detoxify हो जायेगा / ऐसा मैने अनुभव किया है /

H.I.V. के मरीजों के complications और दूसरे disorders को देखने और समझने मौका मुझे मिला है और इसके अलावा मुझे और भी अनुभव HIV के मरीजो के काम्पलीकेशन्स के बारे मे हुये है , उनको मै फिर कभी आप सबके साथ शेयर करून्गा /

INTRODUCTION TO E.T.G. AYURVEDASCAN TECHNOLOGY ; IN HINDI LANGUAGE ; FREE BOOK DOWNLOAD ; FIND THE LINK TO SLIDESHARE.COM/DRDBBAJPAI ; ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन टेक्नोलाजी का परिचय, पुस्तक का हिदी सन्स्करण इन्टर्नेट पर मुफ्त मे उपलब्ध है ; जानिये आयुर्वेद की आधुनिक हाई टेक्नोलाजी ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन टेक्नोलाजी के बारे मे विस्तार से कि यह क्या है ?


LONG AWAITED BOOK ON THE INTRODUCTION OF E.T.G. AYURVEDASCAN TECHNOLOGY ; is now available free on internet. The internet edition can be downloaded free of cost from the following given  link.

So many requests from the Ayurveda lovers to know about the E.T.G. AyurvedaScan Technology as a primary as well as advance level  introduction desired by the practitioners. Although much have been published about the technology  in Ayurveda journals about the technology along with publication of  research papers in Ayuveda Journals and several magazines.

It is felt by me that majority of Ayurvedic doctors and Ayurveda lovers do not know  even the least about the ETG AyurvedaScan technology, so therefore it is a difficult task to understand the technology for them. Narration about the technology to each and every one is a difficult job for me, therefore I thought to write a small book as a introductory material for all and for those who can use it.

The following link is given ;

Thjs book is in HINDI LANGUAGE and  contains the essential information about  E.T.G. AyurvedaScan and its procedures and theory and practices.

This book is a first attempt to give the information and technique of the technology in a place.

मस्कुलर डिस्ट्राफी ; मान्श्पेशियों का मोटा होना ; लाइलाज बीमारी का इलाज आयुर्वेद और आयुष चिकित्सा विग्यान मे सम्भव है


मस्कुलर डिस्ट्राफी यानी शरीर की मान्श्पेशियो मा मोटा होना और उनका आकार बढना ; यह एक तरह की आधुनिक चिकित्सा विग्यान के हिसाब से लाइलाज बीमारी है /

लेकिन यह भले ही लाइलाज बीमारी बता दी गयी हो और इसका कोई इलाज नही है ऐसा समझना गलत है / यदि आधुनिक चिकित्सा विग्यान मे इस बीमारी का इलाज नही है तो इसका मतलब यह नही निकाला जाना चाहिये कि बीमारी लाइलाज हो गयी है /

आधुनिक आयुर्वेद मे ऐसी तमाम बीमारियो का इलाज है जिनको अधिकान्श्त: चिकित्सक लाइलाज बता देते है / अभी तक चिकित्सक गणो को पता ही नही था कि इन सभी बीमारियो का इलाज आयुर्वेद मे है / आयुष चिकित्सा विग्या जिसमे आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी और सिध्ध और प्राकृतिक चिकित्सा के मिले जुले कम्बाइन्ड और इन्टीग्रेटेद तरीके से इलाज करने और मैनेज्मेन्ट करने से ऐसी तमाम बीमारियो का इलाज सम्भव है जिनको लाइलाज बता दिया गया है /

मस्कुलर डिस्ट्राफी भी ऐसी ही श्रेणी की बीमारी बता दी गयी है जिसका कोई इलाज नही है / लेकिन अब ऐसी बीमारी का इलाज सम्भव है /

नीचे दिया गया केस एक 5+ साल के लड़्के का है / जब यह तीन साल का था तब इसको पी०जी०आई० चन्डीगढ मे दायग्नोस किया गया था कि इसे मस्कुलर डिस्ट्राफी है / इसके पैरेन्दोट्स को बताया गया कि  इस बीमारी का कोई इलाज नही है और यह लाइलाज बीमारी है , इसको जीवन भर ऐसे ही गुजारना होगा / बच्चे के पैरेन्ट्स ने बहुत जगह अन्ग्रेजी इलाज कराया लेकिन बीमारी ठीक होने मे किसी भी तरह की कोई  सफलता नही मिली  / २ साल तक इलाज कराने के बाद किसी ने मेरे यहा आकर इलाज कराने की बात बतायी /

मरीज का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्क्लैन परीक्षण किया गया / उसमे प्ता चला कि इसे किस किस सिस्टम की कितने लेवल की और कितनी इन्टेन्सिटी की कार्य विकृति और विकृति मौजूद है / इस बच्चे के जितने भी सम्भव टेस्ट थे वह सब किये गये /

नीचे दी गयी टेस्ट रिपोर्ट मे लम्बे समय तक किये गये आब्जर्वेशन और रिकार्डिन्ग से पता चला कि इसे अन्दर शरीर मे किस तरह के परिवर्तन टाइम टु टाइम होते रहते है , यहइलाज करने और   चिकित्सा के लिये जानना बहुत जरूरी होता है /

 

 

ऊपर की रिपोर्ट देखने पता चला कि इस बच्चे को हमेशा बुखार बना रहता है और यह घटता बढता रहता है / ई०टी०जी०  आयुर्वेदास्कैन  वेव्ज भी एक समान नही है और इनमे हारीजेन्टल और वर्टीकल दोनो ही वेव्ज अनियमित है / इस तरह की अनियमित वेव्ज से रोग निदान करने मे और इसके हिसाब से सटीक द्वाओ का चुनाव करने मे सफलता मिलती है और किसी तरह की गलती की गुन्जायश नही रहती है /

इस बच्चे का रोग निदान करके और इसकी बीमारी का कारण खोज लेने के बाद इसे आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी और अन्य दवाओ का प्रेस्क्रिप्शन १२० दिन तक खाने के लिये बता दिया गया है /

हमारे यहा जितने भी मस्कुलर डिस्ट्राफी के रोगी इलाज के लिये आये है  सभी को आरोग्य मिला है /

MUSCULAR DYSTROPHY ; A CASE OF 5+ YRS OLD MALE CHILD ; E.T.G. AYURVEDASCAN FINDINGS REVEALS THE GENESIS OF THE DISORDERS ; BOY PRESCRIBED AYURVEDA AND HOMOEOPATHIC AND UNANI AND OTHER MEDICATIONS FOR THE COMPLETE TREATMENT


A boy aged 5 yrs , suffering from MUSCULAR DYSTROPHY since 2 yrs and was told by the physician that this is a incurable condition and have no treatment for the condition so for .

The Father of the boy is in defense service and he consulted me before few days back. I narrated all the procedure which we do for every patient. He came to day for the consultation.

We completed possible examination and tests of ETG AyurvedaScan and the related examination, possible to the younger child.

A part of the examination report is here for the observation. ETG AyurvedaScan continuous monitoring device provides at a time many parameters which of use in diagnosis of the genesis of the disorders along with the other ETG AyurvedaScan examinations. See the following report.

 

Above report shows the regular recording and continuous recording of the many parameters of the vital organs functions for example pulse rate per minute and oxygen saturation in blood and blood pressure  and temperature and heart functions  etc etc recording time to time at a set interval  An extra lead is for the ETG AyurvedaScan monitoring the part and organs for a long period.

In this case the long term recording of ETG AyurvedaScan shows the unnatural findings related to some body systems which are not supporting to care for normal functioning.

In this recording , it is shown that there is pathophysiology present in the neuro-musculo systems which is related to the upper part of the digestive system and large intestines. The problem of the boy is a combined and cumulative disorders of the Upper digestive system, muscular system, lymphatic system, circulatory system, autonomic nervous system either in parts or complete involvement.

A prescription of Ayurveda and Homoeopathy and Unani and other remedies is given to boy for 120 days.

Earlier it is seen in Muscular Dystrophy cases, Combined and Integrated treatment of Ayurveda and Ayush, provides treendous relief to the victims of these disorders.

In our research center, we are treating muscular dystrophy patients successfully with relief.

The disease MUSCULAR DYSTROPHY is an INCURABLE DISEASE CONDITION and in modern medicine there is no treatment, but hope of light is persists with Ayurveda and AYUSH therapies treatment. Let the people should use these therapies , if it is said the disease is incurable by a physician. 

PAIN KILLERS MAY CAUSE ”HEART DISORDERS” ; NEW RESEARCH STUDIES REVEALS THE TRUTH ; PAIN TREATMENT AND MANAGEMENT CAN BE BEST HANDLED BY AYURVEDA AND AYUSH THERAPIES TREATMENT AND CHANGE OF LIFE STYLE


A NEW STUDY SHOWS THAT use of pain killers may cause heart / cardiac problems / disorders. Earlier to that it was also assumed that pain killers cause and pay a role for KIDNEY failure.

Below given report , published in DAILY JAGARAN HINDI NEWS PAPER, published from Kanpur, uttar pradesh India, should be taken in notice by readers.

PAIN MNAGEMENT by AYURVEDA and AYUSH treatment ;
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1- Pain of all kinds can be managed by AYURVEDA and AYUSH therapies treatment, whatever they may be.

2- The necessity in pain management that patient shuold be given instructions , what he should do or should avoid to save from pain attacks.

3- Many Food articles triggers and alleviate pain level. Aggravation of pain is always circumstantial due to ignorance. In fact AYURVEDA is very clear about the pain causing food and pain elevating food both. What to do or what not to do, this is in management of AYURVEDA, suggesting during and after treatment.

4- Most of the Neuro-musculo skeletal problems are not covered by the Modern system of medicine and for that ignorance of physicians practicing Modern medicine are not aware that if the remedies or treatment are not in their system, there is no treatment, while the conditions they say is treatable in AYURVEDA and AYUSH treatment. Ignorance is the one of the reason for managing painful conditions.

5- It is blaimed that Ayurveda is slow to work. THIS IS A WRONG NOTIONS.  The fact is that Ayurveda / Ayush therapies treat the basic cause of the pain causing factors. while in comparison the painkillers only minimised pain and do nothing with the  basic / root problem of the pain causing factors. There is difference in between the pain killers, which suppresses the pain and do nothing with the causing factors,comparatively AYURVEDA and AYUSH therapies treatthe causing factors of the pain in root level.

6- N urological pains are Sciatica, Facial neuralgia, migraines etc, Skeletal pain for example Osteoarthritis / Osteo-myelitis, Muscular pains are Rheumatic / Rheumatoid arthritis can be managed well including treatment

7- Kidney lithics / Kidney stone pain can be managed well including treatment, Ayurveda / ayush remedies melts the stone and cures even hydro-nephrosis presents.

ADVANTAGES OF PAIN KILLERS ; 


Pain killers can never be discarded or left for treatment. Pain-killers are the essential part of the treatment. My experience with pain killers are very nice. My style of using pain killers are like this.

I use pain killers when patient is very severely affected with the pain and pain can not bearable for patient of any age .I use pain killers in all painful conditions, whatever they could be used for minimizing pain level. This I do for saving patient agony and  to provide  relief and minimizing pain and  miseries of pain effects. As a result in sense of relief, I again watch and see the exact reason of pain. These findings of true nature leads to the exact reason of pain. When causes of pain is treated the , the refelective sensation of pain relieves.

This I do to save patient from pain intensity.

DISADVANTAGES OF PAIN KILLERS ;

1- Disadvantages of Pain-killers are to be noted seriously. Pharmacological actions of 
the painkiller are not well understand and the theory of pain killers are not matched with 
the actual understanding the  condition of patient.

2- After taking pain killers , some actions are happen in body. [a]may relaxes the area of 
inflammation [b]may sedate the area of inflammation [c]may numb the area of inflammation
[d] may inhibit the pain sensation etc etc. The active ingredients and the salt of pain
killer can react in this way.

3- Patient understand that his pain or complaints have gone and is relieved, as a
reaction he does to start working as usual and this cause the tearing and breaking 
and spoiling of tissues of the affected organs and thus damages the part badly 
like tearing of ligaments, cartilages,tendons, muscles fibers. As a result the 
affected part inflamed and swelled more and more, causes serious illness.

4- Pain killers should be used with caution. It should be kept in mind that repeated
pain attack either severe or mild is a signification of some internal organ's problems and 
this condition should be treated. After treatment of original causing factors of pain, 
there will be no need of pain killers. 

Lastly I will say that except few conditions, pain can be managed by Ayurvda and 
Ayush system of healing.

The last goal of the physician should be provide relief from pain to a patient for which he is treating by any efforts, whatever they may be and intelligent use of the tactics should be applied as and when required.

 

 

TWO CASES OF H.I.V. INFECTED PATIENT TREATED BY OUR CENTER ; SEE THEIR REPORTS AND PROGRESS TOWARDS CURE ; एच० आई० वी० सन्क्रमण के दो रोगी जिनका आयुर्वेदास्कैन आधारित आयुष और आयुर्वेद का इलाज किया जा रहा है ; ये किस तरह ठीक हो रहे है इनके रिपोर्ट देखिये


एच०आई०वी० के रोगियों का हमारे केन्द्र मे इलाज किया जा रहा है /In our outdor hospital, we are treating H.I.V. infected patients by AYURVEDA AND AYUSHA AND ALLIED METHODS OF TREATMENT SYSTEMS.

नीचे एक पुरुष की रिपोट दि गयी है / यह उस समय की जान्च रिपोर्ट है जब मरीज पहली बार हमारे यहा इलाज के लिये आया था /Below is given two patients progress reports, who are treated by our center and the patient came before 8 months for treatment purposes at our center.

मरीज का इलाज १२० दिन तक करने के बाद उसका दुबारा एच०आई०वी सन्क्रमण का लेवल जान्चने के लिये परीक्षण कराया गया जिसकी रिपोर्ट नीचे दी गयी है / दोनो रिपोर्ट को देखिये और बीमारी मे आये हुये परिवर्तन को देखिये /After 120 days of Ayurveda Treatment, the same examination were done again and the progress can be seen in the report that parameters are touches normal level slowly and gradually.

[२]

दूसरा केस एक महिला का है जिसको अपने पति से एच०आई०वी० का सन्क्रमण हो गया था / इस महिला का इलाज करने के पहले का जान रिप्र्ट नीचे दिया गया है /This is the second case of HIV infected patient who is female.The report is at the time of the start of AYURVEDA AND AYUSH   treatment . See and observe below given report.

 

इस महिला का आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और यूनानी के अलावा प्राक्रतिक और योग के साथ काम्बीनेशन / इन्टीग्रेटेद दवाओ और मैनेज्मेन्ट के द्वारा १२० दिनों तक किया गया / इसके बाद इसकई दुबारा जान्च करायी गयी /A combination / integrated Ayurveda and Ayush treatment and management were given to this lady patient for 120 days.

दुबारा जान्च करने की रिपोर्ट आप सभी के सामने है /After a primery course of Ayurveda – Ayush treatment of 120 days the patient was suggsted to go for the screening of the same test which have been done earlier.

दोनो रिपोर्त को देखिये और आयुर्वेद चिकित्सा पर भरोसा करिये कि किस तरह से ऐसी लाइलाज बीमारियो का इलाज सम्भव है /See and observe the both reports and see the changes towards the normal parameters.

We have always conveys to the medical fraternity that Combination / Integrated system of medical sciences, whether they are called complementary or other as per their own public, the treatment of the dreaded diseases are possible by Ayurveda / Ayush bases on the findings of ETG AyurvedaScan system along with other allied examinations.

 

 

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WE PROVIDE AND SUGGESTS  WORLD CLASS SPECIALTY OF AYURVEDA AND AYUSH BASES DIAGNOSIS AND TREATMENT AND MANAGEMENT AT OUR CENTER

A CASE OF ”MENTAL DISORDER’ ; EXAMINED BY E.T.G. AYURVEDASCAN TECHNIQUE ; SURPRISING ULTIMATE CONCLUSION ; एक मानसिक रोगी का परीक्षण ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन द्वारा किया गया और ्बीमारी की जड़ का अन्तिम निष्कर्ष क्या निकला ?


दिनान्क १ मई २०१७ को छ्त्तीस गढ राज्य से आये एक २३ साल के नवयुवक जिसको पिछले कई सालों से मानसिक बीमारी है , इलाज के लिये हमारे केन्द्र कानपुए शहर उत्तर प्रदेश मे आया /

यह नव युवक अपने साथ अपनी बीमारी से समबन्धित तकलीफो को एक कागज मे लिखकर लाया था / लेकिन उसने मुझे नही बताया कि उसे क्या और किस तरह की बीमारी है /

मेरे असिस्टेन्ट डाक्टर ने इस मरीज का ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन परीक्षण किया / इस मरीज के कुछ विशेष परीक्षण और अधिक किये गये , यह इस बात को ध्यान मे रकहकर किये गये ताकि बीमारी की जड़ या बीमारी की जेनेसिस का पता लगाया जा सके /

अधिकतर चिकित्सक बीमारी के सिम्पटम या लक्षणो को सुनकर या देखकर लाक्षणिक उपचार करते है, उससे लाक्षणिक फायदा तो हो जाता है लेकिन बीमारी का स्थायी इलाज नही हो पाता है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन चून्कि पूरे शरीर का परीक्षण करता है और इसी कारण शरीर के सिस्टम्स मे व्याप्त व्याधियो का डाटा उपलब्ध कराता है जिससे पता चलता है कि शरीर की क्या और कैसी स्तिथि है / हमारे रिसर्च सेन्टर मे ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन का परीक्षण कई हालातो मे और परिस्तिथियो मे शरीर कैसा काम करता है और  शरीर के अन्ग और सिस्टम्स  किस तरह से रिस्पान्स करते है ौर उनमे किस तरह के परिवर्तन होते है इन सबका अध्ध्य्यन करते है और उसको को-रिलेट करते है और इस बात का निष्कर्ष निकालते है कि बीमारी की मुख्य वजह क्या है ? यानी बीमारी की जेनेसिस क्या है /

आयुर्वेद मे बताया गया है कि वात और पित्त और कफ इन तीन अवस्थाओं मे शरीर की क्या स्तिथि होती है / हमारे केन्द्र मे सभी मरीजो का परीक्षण इसी बात को ध्यान मे रखकर करते है / RESTING POSITION और LONG RESTING POSITION  और ंMOTION POSITION और REST AND SLEEP POSITION के अलावा मरीज के व्यक्ल्तिगत परेशानियो के हिसाब से परीक्षण किये जाते है / यह सब कवायद इस्लिये की जाती है ताकि मरीज की तकलीफ का सटीक और अचूक निदान किया जा सके /

सभी तरह के परीक्षण किये गये  जिसमे करीब साढे चार घन्टे लग गये / जब सभी रिपोर्टें तैयार हो गयी तब उसकी सब रिपोर्टो को देखने का मौका मुझे मिला /

रिपोर्ट देखने के बाद मुझे पता चला कि मरीज को मानसिक बीमारी है क्योन्कि उसके रिपोर्ट के शाटा [१] सर्कुलेटरी सिस्टम [२] आटोनामिक नर्वस सिस्टम [३] हारमोनाल सिस्टम [४] डायजेस्टिव सिस्टम के अलावा शरीर की केमिकल केमिस्ट्री मे इम्बलन्स के अलावा  अन्य बातो का पता चला /

मैने मरीज को उसकी सारी तकलीफ मरीज और उसके साथ आये लोगो से शेयर की और उनको विस्तार से बताया कि उसको यह तकलीफ क्यो और कैसे हुयी और इसके बीमारी के डेवलप होने का क्सि तरह रास्ता बना /

सब कुछ बता देने के बाद मरीज ने अपनी जेब से एक कागज निकाला और मेरे सामने रख दिया / मैने कागज मे लिखी सभी बाते पढकर सुनायी / इसमे वही सब था जो मै मरीज को सबसे पहले ही बता चुका था /

हमारे इन्वेस्टीगेशन मे निष्कर्ष के रूप मे कुछ बाते मिली ;

१- मरीज को कई साल पहले कई महीनो तक बुखार आतारहा जिसका इलाज अलोपैथी दवाओ के द्वारा हुआ / LONG REST POSITION ETG AyurvedaScan जान्च मे इसके बुखार के बारे मे पता चला कि इसे 99 डिग्री से लेकर 100.5 डिग्री तक का बुखार बना रहता है /

२- ई०टी०जी० रेस्ट पोजीशन की रिकार्डिम्ग मे पता चला कि इसका ब्लड सर्कुलेशन सिर की ओर अधिक है / ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के निदान के हिसाब से यह शरीर की अबनार्मल स्तिथि है / PSYCOLOGICAL AND PSYCHOSOMATIC   DISORDERS  के मरीजो मे ऐसी waves  मिलती है जिनसे डाय्ग्निसिस हो जाती है कि इसे किस तरह कि बीमारी है /

३- शरीर की CHEMICAL CHEMISTRY  मे बदलाव आने से या imbalance  होने से यह बीमारी और ज्यादा जोर पकड़्ती है और ठीक होने का नाम नही लेती है /

हमारे यहा जितने भी मानसिक रोगी आय्र है सभी ठीक हुये है क्योन्कि हमारा मानना कि सही निदान और मर्ज की पकड़ होने से आयुर्वेद और होम्योपैथी और यूनानी और एलोपैथी के साथ्साथ प्राकृतिक और योग का मैनेज्मेन्ट करने से और इस तरह काम्बीनेशन / इन्टीग्रेटेद इलाज करने से सभी तरह की बीमारियो मे अवश्य लाभ होता है /इस रोगी को भी आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक और एलोपैथिक और यूनानी दवाये लिखी गयी है / मरीज को १२० दिन बाद दुबारा आकर दिखने के लिये कहा गया है /

इन्टीग्रेटेद या काम्बीनेशन इलाज देने की वजह यह है कि बीमारी के समीकरण जिस तरह से बन जाते है उनमे एक बाधा यह आती है कि जिस सिस्टम से आप इलाज करते है हो सकता है कि उस सिस्टम मे इलाज के लिये मुहैया दवाये न हों या बेहतर और अच्छी दवा न हो और यह समभावना हो सकती है कि  दूसरे सिस्टम मे उस समीकरण की बेहतर और उच्च कोटि की दवाये और औषधियां हों / उदाहरण के लिये गुर्दे की पथरी के इलाज के  लिये  HOMOEPATHIC  दवाये बेहतर काम करती है और पथरी को धीरे धीरे मेल्ट करके दर्द तथा दूसरे लक्षणो को शान्त करते हुये पतह्री को गलाकर निकाल देती है / इसमे कुछ समय लग सकता है लेकिन इस बढते समय को अगर कम करना है तो इसके साथ मे आयुर्वेद की दवाओ का उपयोग अगर करते है तो बीमारी ठीक होने का समय काफि कम हो जाता है यानी अगर गुर्दे की पथरी का इलाज होम्योपैथी के साथ्साथ आयुर्वेद दवओ का भी उपयोग करते है तो गुर्दे की पथरी शीघ्रता से ठीक होती है और अगर इसके साथ्साथ प्राकृतिक चिकित्सा का खान पान अपनाते है तो बीमारी ठीक होने मे कुछ समय घट जाता है /

यही कारण है कि हमारे यहा आने वाले सभी मरीजो को आवश्यकता पड़ने पर काम्बीनेशन अथवा इन्टीग्रेटेद इलाज भी देने की ब्यवस्था है /