AYUSH Scan

दान्तों तथा मसूढों और मुख के अन्दर के तमाम विकारों के लिये आयुर्वेद का दन्त मन्जन ; Ayurvedic Tooth Powder for Dental and Oral Problems


आयुर्वेद पूर्ण चिकित्सा विग्यान है / आदि काल से हमारे चिकित्सा पूर्वजों ने समाज को स्वस्थय बनाये रखने के लिये बहुत से नुस्खे लिपिबध्ध करके दिये है , जो आज भी उसी तरह से कारगर और प्रभावशाली है, जैसे उस समय थे /

दान्तों के रोगों के उपचार के लिये आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रन्थों में प्राय:
सभी आचार्यों ने जितना भी अनुभव और ग्यान प्राप्त किया था , उसका वर्णन बहुत सूच्छमता के साथ किया है /

चिकित्सा चन्द्रोदय़ चिकित्सा ग्रन्थ में दान्त के रोगों के लिये एक नुस्खा दिया गया गया है, जो दान्त की बहुत सी बीमारियों में बहुत प्रभाव शाली साबित हुआ है / यह बहुत सरल और सफल योग है /

योग मे निम्न काष्ठौशधियों का मिश्रण है /

मिश्रन; हरड़, बहेडा, आमला, सोन्ठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, शोधित तुथ्थ, सेन्धा नमक, रूचक नमक, विड नमक, पतन्ग, माजूफल , ये सब द्रव्य बराबर बराबर मात्रा मे लेना चाहिये / इन सभी द्रव्यों को महीन कूट पीसकर पाउडर जैसा बना लेना चाहिये और बाद में मैदा छानने वाली चलनी से छान लेना चाहिये और किसी एयर टाइट डिब्बे में बन्द करके रख लेना चाहिए /

उपयोग के लिये किसी छोटे प्लास्टिक के डिब्बे या कान्च की शीशी में इस चूरन को रख लेना चाहिये /

एक ग्राम चुर्ण को लेकर दान्तों में मलना चाहिये / जो ब्रश से इस मन्जन को लेकर उपयोग करना चाहे वे ब्रश के साथ इसे दान्तों में मल सकते है / जिन्हें दान्तों मे दर्द हो, मसूढों मे दर्द हो, जिनके दान्त सेन्सिटिव हो गये हों, ठन्डा या गरम पानी लगता हो, या हवा या छूने से दर्द होता हो या दान्तों की अन्य कोई तकलीफ हो , उन सबमे यह दन्त मन्जन असर करक है /

मन्जन करते समय यदि इसमें एक बून्द “नीम का तेल” मिला लें और फिर मन्जन करें तो मुख रोग के लिये यह एक उत्कृष्ठ औषधि हो जाती है /

जिनके दान्त कमजोर हो गये हैं , मसूढॊ के विकर हों, पायरिया से पीडित हों , दान्त हिलने लगे हों और जड़ से कमजोर हो रहे हों, उनको यह मन्जन अवश्य उपयोग में लेना चाहिये /

नीम के तेल को इस मन्जन में मिला लेने से यह मन्जन दान्तों के सभी प्रकार के infection को दूर कर देता है, दान्तों में लगे हुये कीड़ों को यह नष्ट कर देता है /

इस मन्जन को ब्रश से न लगाकर यदि उन्गलियों से मन्जन करते है तो अधिक फायदा करता है और शीघ्र लाभकारी है /

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सफेद दाग बढने और न ठीक होने का कारण ; जीवन शैली में बदलाव , प्रतिकूल खान-पान और कुछ Allopathic दवायें ; LEUCODERMA & Life-style and some Remedies


बहुत से आयुर्वेदिक वैद्य और आयुर्वेदिक चिकित्सक अक्सर पूछते रहते हैं कि सफ़ेद दाग Leucoderma के रोगियों का रोग अचानक ही बहुत तेजी से बढने लगता है , जबकि वे दवा दे रहे होते है और अच्छे से अच्छा इलाज कर रहे होते हैं , उनके रोगी ठीक भी हो रहे होते है फिर ऐसा क्यॊं होता है कि सफेद दाग ठीक होने के बजाय बढते चले जाते है? इस तरह की रोग-बढने से रोकने के सारे उपाय कम नहीं होते, जिससे मरीज और चिकित्सक दोनो के सामने बहुत विचित्र स्तिथि पैदा हो जाती है ?

यद्यपि यह स्तिथि मेरे सामने पिछले २० सालों से कभी नहीं आयी / मैने इस सवाल पर और ऐसी स्तिथि के लिये जिम्मेदार कारणो का पता करने का प्रयास किया है /

पहला कारण मेरी समझ में यह आया है कि लियूकोडर्मा के मरीज स्वस्थय वृत्त के नियमों का पालन नहीं करते है, जिससे उनको पाचन सन्स्थान से सम्बन्धित कार्य- विकृति बनी रहती है / ऐसे रोगी अपचन, एसीडिटी, Irritable Bowel syndromes, Inflammatroy condition of bowels, constipation, irregular bowels आदि आदि से ग्रसित होते हैं / Digestive system से सम्बन्धित यह तकलीफें दूषित खान पान से पैदा होती हैं / कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे है जो सफेद दाग बढाने में सबसे आगे है / जैसे चाऊमिन, सिरका या Vinegar या सिरका युक्त खाद्य पदार्थ, non-veg foods, अत्यधिक मसाला और चर्बी युक्त खाद्य पदार्थ जैसे चाट, समोसा आदि आदि / इन और इन जैसे खाद्य पदार्थ खाने से सफेद दाग बढते है / ऐसे खाद्य पदार्थ Digestive system के लिये बहुत सेन्सिटिव होते है और यह एक तरह से sudden painless allergical reaction like action पैदा करते है जिससे त्वचा की melenine अचानक घटकर सफेद दाग को और अधिक बढाने का काम करती है /

बहुत से रोगियों के रोग-इतिहास chronological case-history को देखने और समझने के बाद यह बात दृस्टिगत हुयी हैं कि जीवन शैली के कारण और दूषित खानपान के कारण सफ़ेत दाग अधिक तेजी से विकसित हुये और उनके रोकने के सभी प्रयास फ़ेल हो गये / किसी किसी रोगी ने बताया कि उनके सफ़ेद दाग हर मिनट में बढते चले गये / किसी ने बताया कि उनके सफ़ेद दाग एक दो दिन में ही इतने बढ गये जो उनकी उम्मीद से परे थे / ऐसा तभी होता है जब शरीर का सिस्टम बहुत सम्वेदन शील हो जाये और अक तरफा कार्य करने लगे /

कई रोगियों के रोग इतिहास को देखने के बाद यह बात भी पता चली कि एलोपैथिक चिकित्सा विग्यान की कुछ दवायें सेवन करने के बाद शरीर में कुछ ऐसे परिवर्तन हुये , जिनके कारण सफ़ेत दाग अधिक तेजी से विकसित हुये और दागो को बढने से रोकने के सभी प्रयास फ़ेल हो गये /

इसी कारण से रोगियों कॊ हिदायत दी जाती है कि उन्हे चाहे कैसे भी acute problem हों या sudden ailments हो जायें , वे एलोपैथी की कुछ दवायें न लें तो बेहतर होगा / देखा गया है कि एलोपैथी की दवा खाने के बाद सफेद दाग किसी किसी रोगी के बहुत बढ जाते हैं फिर किसी तरह से ठीक नहीं होते है या ठीक होने में बहुत ज्यादा समय लग जाता है / इसलिये यदि तकलीफ हो तो फिर आयुर्वेदिक दवायें लें या प्राकृतिक उपचार लेना चाहिये /

Leucoderma के इलाज में बहुत सावधानी बरतनी होती है, यह बहुत sensitive disease condition है, इसलिये पथ्य परहेज , जीवन शैली में बदलाव, खान पान में परहेज और दूसरी हिदायतो को यदि follow किया जाये तो आरोग्य शीघ्र प्राप्त होता है /

हृदय रोगों के मरीजों के लिये एक आयुर्वेद तथा दूसरा होम्योपैथी का दिल को मजबूत करने वाला टानिक


दिल की बीमारी के मरीज बनना अच्छी बात नहीं है / आदि काल से हृदय रोग होते रहे है, आज के महौल में हो रहे है और आगे भी होते रहेन्गे / यह सिल्सिला चलता रहेगा /

मानसिक तनाव इस बीमारी का एक कारण सभी चिकित्सक बताते है / “तनाव” तो हमेशा और हर युग और हर समय में रहा है / ऐसा कौन सा समय सुरक्षित कहा जा सकता है जब मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक परिवेश में तनाव न रहा हो / चाहे वह राजा महाराजाओं का समय रहा हो या कोई अन्य समह और काल / मानसिक तनाव के बहुत से कारण होते है / किसी एक कारण को फिक्स नहीं किया जा सकता कि तनाव का यही एक मुख्य कारण है /

यह कहा जाता है कि जीवन शैली के बदलाव के कारण ह्रूदय रोग पनपते है, यह आज की बात नहीं है / प्राचीन काल में राज दरबारों में, धनी मानी लोगों के यहां, वैवाहिक तथा अन्य समारोहों में शाम को सजी हुयी महफिलें देर रात तक चलती रहती थीं और उसी अनुसार लोगों की दिन चर्या होती थी / यही सिलसिला आज भी जस का तस चल रहा है लेकिन उनका स्वरूप बदल गया है /

Cut section of HEART with their identity

Cut section of HEART with their identity

यह सही है कि हृदय रोगों के निदान ग्यान में Diagnosis के लिये आज हमारे पास् बहुत से मशीनी साधन उपलब्ध है जो पहले नहीं थे / लेकिन इतना सब होते हुये हृदय रोग जस के तस है बल्कि उनकी सन्ख्या बढती चली जा रही है / यह विचारणीय विषय है कि इसका क्या कारण हो सकता है ?

अधिकतर हृदय रोग उन लोगों को होने की सम्भावना रहती है, जिनके परिवार में पिता को यह रोग होता है / यह genetic tendency होती है, इसलिये heart disorders होने की सम्भावना सबसे अधिक इसी group को होती है / लेकिन इसमें अपवाद है, ऐसा सभी के साथ नही होता, अगर mother side से arthritis या skin disorders जैसी कोई metabolic disorders की problem हो जाये तो फिर ह्रूदय रोग की सम्भावना जब तक अनुकूल परिस्तिथियां न बने तब तक नहीं होता है /

एक और कारण हृदय रोग का है जिसे high blood pressure अथवा low blood pressure कहते हैं / अकेले ब्लड प्रेशर की तकलीफ हो तो यह warning signal समझना चाहिये , लेकिन यदि यह Diabeties के साथ हो जाय तो और भी खतरनाक है / डायबेटीज से ब्लड प्रेसर control करने में दिक्कत आती है / हलान्कि यह भी जरूरी नहीं कि जिसे Blood pressure हो उसे डायबेटीज जरूर होगी या जिसे डायबेटीज हो उसे ब्लड प्रेसर जरूर होगा / ऐसा होता नही है और जहां तक मेरा अनुभव है कि यह ratio केवल 40 प्रतिशत [अनुमानित] रोगियों में देखने में आता है / इसलिये ऐसे रोगियों को हृदय रोग से बचने के लिये विशेष ध्यान देना चाहिये /

आयुर्वेद मे बहुत सी औषधियां हृदय रोग के उपचार के लिये उपस्तिथि हैं उनका उप्योग किसी सिद्ध हस्त वैद्य की देख रेख में करना चाहिये / आयुर्वेद में “अर्जुन” की छाल [Latin; Terminalia Arjuna] का गोदुग्ध-नीर मिश्रित क्षीर-पाक तथा अन्य औषधीय द्रव्यों के साथ मिलित क्वाथ अथवा काढा सेवन करने से हृदय रोग की सम्भावना से बचत होती है /

इसी प्रकार होम्योपैथी की दवा Crateagus Oxycantha Q के सेवन से हृदय रोग में आश्चर्य जनक फायदा होता है / यह हृदय के लिये टानिक का कार्य करती है /

जिन्हे हृदय रोग हो वे इसे अन्य दवाओं के साथ [ as a supplementary remedy ] ले सकते है / यह safe बनौषधियां है और इनका कोई side effect नही होता है /

अच्छा होगा ऊपर बताई गयी दवा सेवन करने से पहले अपने नजदीक के किसी आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक चिकित्सक से इन औषधियों के बारे मे अधिक जानकारी प्राप्त कर लें /

A FEMALE case of HYPER-THYROIDISM with other gyneacological disorders एक महिला रोगी की हाइपेर-थायरायड के साथ साथ अन्य गायनोकोलाजिकल बीमारी की समस्या



यह केस एक ३५ साल की महिला का है , जिसको Hyper Thyroidism की शिकायत कई साल से थी / मरीजा ने दिनान्क २६.०६.२०१० को परामर्श किया था /

महिला को निम्न शिकायते थी, जिनके लिये वह परामर्श के लिये आयी थी /

१- अनियमित मासिक धर्म
२- मासिक होने से १० दिन पहले से मानसिक तनाव , अत्यधिक गुस्सा, झगड़ालू प्रवृति
३- मासिक के समय अत्यधिक रक्त श्राव, जिसके कारण रोगिणी बहुत कमजोर हो जाती थी
४- रोगिणी के स्तनॊं में सूजन और गान्ठे पड़ जाती है
५- पेट में सूजन

रोगिणी एलोपैथी का बहुत इलाज करा चुकी थी, उसको एलोपैथी के इलाज से कोई आराम नही मिला / मैने उसको सलाह दी कि अगर वह आयुर्वेदिक इलाज कराना चाहिती है तो वह एक ई०टी० जी० आयुर्वेदस्कैन का परीक्षण करा ले तो उसके सारे शरीर की बीमारियों के बारे मे पता चल जायेगा / दूसरा ऐसा कोई सरल तरीका नहीं है, जिससे उसकी बीमारी के बारे मे पता लगाया जा सके /

रोगिणी ने अपना ई०टी०जी० परीक्षण कराया, जिसकी फाइन्डिन्ग्स निम्न प्रकार से थी /

[अ] त्रिदोष;

कफ १३७.५२
पित्त ६८.७६
वात ५८.१५

[ब] सप्त धातु ;

मान्स १०२.०३
मेद ८१.००

[स] शरीर मे व्याप्त तकलीफॊं का अन्कलन

Mammery Glands 134.00
Lumber spine 122.22
Urinary Bladder 112.50
Mental/emotional/intellect 110.00
Sinusitis 110.00
Thyroid Pathophysiology 106.67
Uterus anomalies 88.50
Pelvic inflammatory disease 88.50
Renal anomalies 80.00
Menstrual anomalies 46.67

[द] रोग निदान ;

Bowel’s pathophysiology
Cervical spondylitis with Lymphadenitis
Epigastritis
Hormonal anomaly
Inflammatory and irritable bowel syndromes
Large intestines anomalies
Lumber pain
Mammary glands anomalies
Nervous temperaments
Tachycardia

इस रोगुणी को बताया गया कि उसे उक्त बीमारियां है / यह देखकर वह घबरा गयी कि इतनी बीमारियां एक साथ हो गयीं है / मैने उसको बताया कि ई०टी०जी० सिस्टम चूंकि सारे शरीर का स्कैन करता है इसलिये जो भी बीमारी या कार्य विकृति होती वह यह सब बता देता है / आयुर्वेद में सम्पूर्ण शरीर की चिकित्सा करने का विधान है, इसलिये जो भी फाइन्डिन्ग्स है उन सबका इलाज एक साथ होगा और आपको सारी तकलीफॊं में एक साथ आराम मिलेगा /

यह सुनकर मरीजा आश्वस्त हो गयी और उसको निम्न चिकित्सा व्यवस्था दी गयी /

अ- कान्चनार गुग्गुल १ गोली ; गले की गान्ठ के लिये
रज: प्रवर्तिनी वटी १ गोली ; मासिक धर्म की अनियमितता के लिये
ब्राम्ही वटी १ गोली ; नरवस्नेस और धड़कन के लिये
पुष्य्यानुग चूर्ण २ ग्राम के साथ दिन में दो बार सादे पानी से

ब- दश्मूलारिष्ट १० मिलीलीटर
कुमारीआसव १० मिलीलीटर
भोजन करने के बाद दोनों समय

मरीजा को १२० दिन दवा सेवन करायी गयी / दवा सेवनोपरान्त वह पूर्ण स्वस्थय है और उसे मासिक सम्बन्धी कोई तकलीफ नहीं है / उसकी थायरायड भी अब सामान्य कार्य कर रही है /

पेट के कीड़े यानी Intestinal Worms ; आयुर्वेदिक उपचार Ayurvedic Treatment


मनुष्य की आन्तों के अन्दर प्राय: Ascarides, Pin worms, Thread worms अधिकतर पाये जाते है / आन्तों के अन्दर ये worms एक पतली झिल्ली का आवरण बनाकर उसके अन्दर पनपते रहते है और अपनी वन्श बृद्धि करते रहते है /

जब एक सीमा से अधिक इनका आकार बढ जाता है, तब इस झिल्ली में cracks होकर ये पूर्ण वयस्क कीडे मल / पाखाना / stool के साथ निकलने लगते है / इससे पहले इनके बारे में किसी को कुछ ग्यात नहीं होता कि उनकी आन्तों में कीडे भी पल रहे है /

हां, कुछ लक्षण जरूर पैदा हो जाते है जिनमें प्रमुख है [१] सोते रहते के समय में मुंह से लार गिरना या बहना [२] मीठी चीज खाने की इच्छा [३] सोते समय दान्तों का किटकिटाना [४] चेहरे पर लालीपन लिये हुये सफेद रन्ग के धब्बे हो जाना आदि Observational symptoms होते है, जिनसे यह रोग निदान करने में मदद मिलती है /

आयुर्वेद मे इसे “कृमि रोग” मानते है / कृमि रोग के उपचार के लिये ऐसे बहुत से योग शास्त्रों में बताये गये है जिनकी सन्ख्या हजारों मे होगी जिनमे एकल औषधि से लेकर रस औषधि और कीमती धातुओं तक के योग दिये गये है / यह सभी इस रोग के उपचार के लिये प्रभाव कारी हैं /

नीचे एक चूर्ण का योग दिया जा रहा है , जो सभी प्रकार के कृमि रोगों को दूर करने के लिये प्रभाव कारी है /

विडन्गादि चूर्ण Vidangaadi Churna

योग; वाय विडन्ग, सेन्धा नमक, सुध्ध हीन्ग, कालानमक, कबीला, बड़ी हरड, छोटी पीपल, निशोथ की जड़ की छाल ; इतने द्रव्य बराबर बराबर लेना है /
Combination; Vay vidang, sendha namak, shudhdh Hing, Kala namak, kabilaa,badi harad, chchoti pipal, nishoth ki jad ki chchaal in equal quantity

इन सभी द्रव्यों का महीन चूर्ण बना लें / इस चूर्ण की मात्रा १ ग्राम से लेकर तीन ग्राम तक है / इसे गरम / गुनगुने जल या दही की पतली लस्सी या मठ्ठा के साथ दिन मे दो या तीन बार लेना चाहिये /Make a fine powder of these all ingredients and the dose is 1 gramm to 3 gramm to be taken with lukwarm water or with butter milk combination one , two or three times a day

उपयोग; इस चूर्ण के सेवन करने से आन्तों में पैदा होने वाले सभी प्रकार के कीड़े , आन्त्र कृमि Intestinal worms of all kinds , Ascarides, Pin worms, Thread worms and other intestinal worms जडमूल से समाप्त हो जाते है / This combination cures all kinds of Intestinal Worms.

आयुर्वेदिक उपचार करने के बाद आन्तों के कीड़े हमेशा के लिये समाप्त हो जाते है और दुबारा इसी तरह की similar problem शायद ही किसी को होती है /

Ayurveda Scanner

Ayurveda Scanner

स्वमूत्र चिकित्सा ; मेरा व्यक्तिगत और व्यावसायिक चिकित्सकीय अनुभव


लगभग चालीस साल पहले मुझे एक पुस्तक “स्वमूत्र चिकित्सा” पर लिखी हुयी पढने के लिये मिली , जो हिन्दी भाषा में थी और उसका प्रकाशन पान्कोर नाका, अहमदाबाद, गुजरात कि किसी सन्सथा द्वारा किया गया था, जो “नर मूत्र चिकित्सा” के प्रचार और प्रसार में लगी हुयी थी /

एक और पुस्तक मुझे पढने के लिये मिली जिसका शीर्षक The Water of Life था और यह किसी ब्रिटिश लेखक द्वारा लिखी गयी थी /

चिकित्सा विग्यान की कुछ magazines मे मैने मूत्र चिकित्सा के बारे में पढा था /

मेरे मन में स्वमूत्र पीकर इस पर experiment करना चाहिये, यह बात जोर पकडने लगी / बार बार जब दिन में कई समय हयी विचार जोर मारने लगा, तो मैने भी ठान लिया कि अब मै स्वमूत्र पीकर एक्स्पेरीमेन्ट जरूर करून्गा /

पेशाब जैसी गन्दी वस्तु, जिसे हम छूना भी नहीं पसन्द करते, उसे पीना तो बहुत मुश्किल काम था / मन मे कई बार विचार बदले , लेकिन अनुसन्धानात्मक स्वभाव एक्स्पेरीमेन्ट के लिये बार बार उसी स्थान पर खीन्च लाता / अन्त में एक दिन मैने दृढ निश्चय कर लिया कि मै अमुक दिन से पेशाब पीना शुरू करून्गा /

एक दिन सुबह मैने अपना पेशाब एक कान्च के गिलास में एकत्र किया / इस पेशाब में अपनी उन्गली डालकर उस पेशाब को अपने गालों में मला / फिर माथे मे लगाया /

दूसरे दिन सुबह अपने पेशाब को लेकर अपना मुह धोया / तीसरे दिन मैने अपने पेशाब से मुह धोया और एक चम्मच पेशाब को होठो पर लगाया और एक दो बून्द पेशाब जबान पर दाल ली / अगले दिन मैने एक कुल्ला पेहाब का किया और एक दो दिन बाद मै आधा कप अपना स्वमूत्र, ताज़ा पेशाब पी गया /

यद्यपि मुझे कोई बीमारी नहीं थी , जिसके लिये मुझे स्वमूत्र पीने की आकांछा थी / मै इसे एक्स्पेरीमेन्ट करके अनुभव और समझना चाहता था कि अपना स्वमूत्र पीने से होता क्या है और स्वास्थय बनाये रखने के लिये स्वमूत्र का शरीर पर क्या असर पड़ता है ?

 इसके अलावा स्वमूत्र का रोगों पर क्या असर होता है , इसका भी अनुभव करना था /

 मैने बाद में एक दिन पेशाब से कुल्ला करने के बाद  ३० मिली लीटर अपना स्वमूत्र पी लिया / इसके पहले मै कई बार “गो मूत्र” का सेवन कर चुका था / “गो मूत्र” का स्वाद और उसका अनुभव मुझे पता था / अपना स्वयम का “स्वमूत्र” पीने के बाद मुझे अपने मूत्र और गोमूत्र मे यह फर्क पता चला कि गोमूत्र का स्वाद, तरलता, गन्ध आदि में मानव मूत्र हल्का होता है, स्वाद में हल्का नमकीन तथा थोड़ा सा खारी होता है / जबकि तुलनात्मक रूप में गोमूत्र का स्वाद यूरिया से सन्युक्त जैसा, तरलता मे अधिक गाढा और पित्त युक्त कडुआ स्वाद होता है /

 पहली बार अपना मूत्र पीने के बाद मुझे कोई विशेष परेशानी नहीं हुयी / इसके बाद से मै रोजाना अपना मूत्र सुबह खाली पेट पीने लगा /

 यह सिल्सिला कई साल चला / जितने दिन मैने अपना स्वमूत्र पिया , उतने दिन तक मुझे सर्दी, जुखाम , बुखार जैसी तकलीफॆ बहुत कम  हुयी , अगर हुयी भी तो एक दो दिन में स्वमूत्र पीने से ही ठीक हो गयी / शरीर का  रन्ग बहुत खिल गया और मै अपनी वास्तबिक उम्र से १० या १५ साल छोटा नजर आने लगा /

 स्वमूत्र के इस अनुभव को लिखकर मैने कई प्रतिष्ठित समाचर पत्रों और मैगज़ीन्स मे लेख स्वरूप प्रकाशित कराया , जिसे पढकर बहुत से लोगों नें इस पर अनुभव प्राप्त किया / 

 मेरा अनुभव है कि जो भी स्वमूत्र का सेवन करना चाह्ते है , वे किसी स्वमूत्र चिकित्सा विशेषग्य की देखरेख में चिकित्सा व्यवस्था करें /

 आयुर्वेद में विभिन्न जानवरों और नरमूत्र के गुण और कर्म के , इनके उपयोग के बारे मे ” भाव प्रकाश ” ग्रन्थ में बहुत विस्तार से बताया गया है /

 

विटामिन की गोलियां खाने से कोई फायदा नहीं


यह हम नहीं कह रहे है, यह कह रहे है ब्रिटॆन के चिकित्सा शोध कर्ता / प्रकाशित खबर को पढ ले , आपको जानकारी हो जायेगी /

हम पहले भी कई बार कह चुके है कि विटामिन के अधिक उपयोग से शरीर मे “हाइपर विटमिनोसिस” की स्तिथि पैदा हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप बहुत सी ऐसी बॊमारियां हो जाती है, जो बाद में असाध्य रोगॊ की श्रेणी में शुमार होने लगता है /

External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body


External Application on LEUCODERMA WHITE PATCHES triggers more violent effects and boosts metastasis of WHITE PATCHES in other parts of body

Our observational study shows that external applications like anti-vitiligo creams and oils for use in the treatment of the LEUCODERMA / VITILIGO, which are instructed by phyrician to apply on the white patches, causes suppressive effects and as a result, the metastasis of the hypomelinosis migrates to the other parts of the body, where the expression of the white patches becomes more prominent and strong.

Many cases treated by the other physician, using external application, patient history reveals the fact that external application causes suppression and more white patches grown in other parts within few hours to few days time rapidly.

After invention of ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan technology, treatment of the bodily disorders are totlly dependent on the findings of the ETG report. The development of the idea of the treatment bases on the ETG findings was successful, when AYURVEDIC MEDICINES were selected on the ground of the measured intesnsity of the Organs / parts of the body including AYURVEDIC FUNDAMENTALS.

In many LEUCODERMA cases, we have not used any external application of any kind and the treatment procedure was lend on the report and findings of the ELECTRO TRIDOSHA GRAPHY ; ETG AyurvedaScan totally. The Internal medicine were given according to the obtained pathophysiological measured intensity of the VISCERAS and other parts. These medicines were AYURVEDIC classical preparation over all.

Our study concludes that when internal organs beomes slowly and gradually normal in their own physiological activities, the pathophysiology of the organs normalizes, and as a result , pigmentation channel becomes free from any inhibition and hurdles and thus abnormal function of the skin becomes normal. This way again melenin pigments the skin with the normal functioning.

In my opinion, while treating LEUCODERMA, no external application should be used, either in any form of Oil or in cream.

LEUCODERMA CURE of a Medical Student [Allopathy] ; ETG AyurvedaScan report based AYURVEDIC Treatment relieved her other complaints including VITILIGO


 
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An Allopathy Medical student consulted me for her LEUCODERMA problem on 6th February 2011. I recorded her ETG AyurvedaScan and the treatment was given her on the basis of the findings of the ETG report. The same day a Photo of the one part of the VITILIGO was taken by me for record purposes. The following PHOTO shows the anomaly.

She was having white patches on both the Lower Extremeties and some smaller ones on her back , Torso and her genital parts etc etc

See, observe and compare the PHOTOS taken after a few months period.

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Right Lower Extremity -  Right Leg white patches

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Right Lower Extremity - Right Leg white patches

COMPARE PHOTO RIGHT LEG White PATCHES from below PHOTO;

This Photo was taken on  29th May 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the  RIGHT  Lower Extremity -  Leg white patches, see the changes in color of white patches

This Photo was taken on 29th May 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the RIGHT Lower Extremity - Leg white patches, see the changes in color of white patches

 LEFT LEG Comparison ;

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the  Left  Lower Extremity -  LEFT Leg white patches

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Left Lower Extremity - LEFT Leg white patches

This Photo was taken on 29th MAY 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the  LEFT  Lower Extremity -  Leg white patches, see and compare the changes in colour of white patches

This Photo was taken on 29th MAY 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the LEFT Lower Extremity - Leg white patches, see and compare the changes in colour of white patches

 
CONCLUSION; Leucoderma and all disease conditions can be well treated with expertise way, if the AYURVEDIC Treatment is taken after ETG AyurvedaScan findings. Cure can be asured af all the bodily ailments, whatever they may be lebelled or nomenclature.
 
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ETG AyurvedaScan recorded traces of a case of CARDIAC SURGERY including grafting of arteries ; Impacts on body due to changes of Electrical behaviour


This is a case of Open Heart CARDIAC SURGERY including grafting of arteries, done eight years back.

The patient originally belongs to Ahamadabad , Gujarat and he came to his relative  at Kanpur during HOLI vacation, , where he heared about the newly invented Ayurveda technology ETG AyurvedScan by his relations.

When I recorded his ETG traces, it was an amazing  and wonderful experience to me at academic level in view of research , which  is unusual, rare and very peculiar.

OBSERVATION of the recorded traces;

1- See minutely the recorded traces and observe the ELECTRICAL BEHAVIOUR  of the patient, which is very peculiar

2- The ELECTRICAL BEHAVIOUR  is not met with the parameters of general recorded traces and in view of NORMAL ELECTRICAL BEHAVIOUR  of human body. 

3- In this case, we have observed that in every second and in every heart beat in “e” recorded trace, the waves “c” “d” “e” “s” are at one time in ‘upward’ [positive] direction and at the immediate next movement in  ‘downward’ [negative] defelection shows.

 4- The same lead shows absence of “c” wave in upward trace and “e” wave in down trace.

 5- The electrical behaviour of this patient is in ‘clock like direction’ that means the flow of body current is from right to left in circular nature. 

6- Due to frequentaly and second to second, electrical behaviour changes in body , patient have sudden HIGH and sudden LOW Blood pressure, which causes him uneasiness and uncomfort in his daily work. He is not able to sleep well in night and move in nightoff and on, when all members of his family sleeps.

 Many more anomalies have developed with the patient, which was not to patient earlier.

Below is the followup ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

 Obsrvation with the comparision of the earlier recorded trace shows tremendous changes in the traces recorded afterwards.

First Follow-up ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

First Follow-up ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

 Obsrvation with the comparision of the earlier recorded trace shows tremendous changes in the traces recorded afterwards.

On 20 March 2011, when patient first visited in clinic , he gave the following complaints, which developed  after cardiac surgery . 

  1. 1.     Fever always persisted in between 99 F to 100 F degree.  After five months Ayurvedic treatment , fever is cured. No problem again reappeared.
  2. 2.     Rapid respiration , severe Dyspnea on least movement, even moving body and changing postures. After five months Ayurvedic treatment , resoiratory problem is cured. No problem again reappeared.
  3. 3.     Lumber pain since 7 years, now cured
  4. 4.     Gaining weight after cardiac surgery , which was 90 kgs on 20/08/2011. Now after five month the weight is 83 kgs.
  5. 5.     Swelling in whole body, now he have no swelling in his body
  6. 6.     Severe constipation and goes for stool after two / three days, now he is going daily stool. No constipation.
  7. 7.     Infection in blood was present before five months, now presently have no infection

 On 20th August 2011, patient followup was recorded. Patient belongs to Ahamadabad , Gujarat. He was happy with his progress of his problem aroused after grafting of artery in his heart.

 Conclusion; In conclusion, it shows that ETG AyurvedaScan system is beneficial on those disease conditions , where it is supposed no treatment. The patient is again given a fresh prescription on the new findings of the ETG report.