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SPECIAL POST on BAL DIVAS ; बच्चों के रोगों का विवेचन ; About Infants and children problems


नवजात शिशु, बहुत छोटे बच्चों और एक वर्ष से लेकर बड़ी उम्र के बच्चों मे रोग उसी तरह के होते हैं जैसा कि बड़े लोगों में /

बच्चों के लिये रोग होने के तीन स्थान मुख्य रूप से होते है / पहला श्वास मार्ग अथवा श्वसन सन्स्थान में होने वाली तकलीफें यानी Respiratory Tract / route anomalies , दूसरा पाचन सन्स्थान से होने वाली तकलीफें यानी Digestive system anomalies और तीसरा त्वचा द्वारा प्रविष्ट विष जन्य दोष मुख्यतया होते हैं /

श्वास मार्ग बाहरी नाक से लेकर फेफडे के अन्दर तक जाता है / वास्तविकता यह है कि बिना स्वांस के कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता है / जैसे ही मनुष्य जन्म लेता है , बाहरी स्वांस का कार्य तब से शुरू हो जाता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है / वायु का तापक्रम, वायु के अन्दर की अर्दता, वायु के अन्दर की गैसों का अनुपातिक मिश्रण और वायु के अन्दर मिल गये अन्य द्रव्य जैसे कार्बन के कण , किसी केमिकल की ड्स्ट इत्यादि के साथ दिन के बिभिन्न भाग यानी सुबह दोपहर शाम रात आठों प्रहर में वायु का मिजाज बदल जाने से और इस वायु को स्वांस के स्वरूप में फेफड़ों द्वारा सेवन करना नित्य का कार्य है / जाहिर है दूषित वायु के सेवन करने से श्वसन सन्सथान से सम्बन्धित तकलीफें बढने की सम्भावना हमेशा बनी रहती है / बच्चों में इसीलिये Spasmodic croup, Laryngitis, Pharyngitis, Tonsilitis, Throat Infection, Bronchitis आदि तकलीफें ज्न्म ले लेती हैं / जो कालान्तर में Asthama के रूप में परिवर्तित हो जाती है / इन्ही तकलीफों के कारण बच्चों को सर्दी और जुखाम तथा बुखार होने की शिकायत जल्दी जल्दी होती है /

दूसरा तकलीफ पैदा करने का रास्ता Digestive system है / बच्चों का गला जैसा कि ऊपर बता चुके हैं जब वायु तथा अन्य दोष मिलकर खराब करते हैं तब कालान्तर में गले मे Streptococcus और Staphilococcus के अलावा अन्य बैक्टीरिया पनपते हैं / ये बैक्टीरिया खाने के साथ साथ छोटी तथा बड़ी आन्त में प्रवेश करते है / लार घून्टने पानी पीने के साथ भी यह क्रम चलता रहता है / एक सीमा तक शरीर इन बैक्टीरिया की सन्खया को बर्दास्त करता जाता है क्योन्कि एक तरफ यह होता है कि आन्तों के अन्दर में व्याप्त बैकटीरिया जो भोजन पाचन में सहायता करते है,

उनकी सन्ख्या कम होती जाती है और गले के सन्क्रमण वाले बैक्टीरिया की सन्ख्या अधिक होती जाती है / इस कारण से रक्त दोष पैदा होकर बच्चों को कई तरह की बीमारियां हो जाती है जैसे डायरिया, कब्ज हो जाना, बुखार रहना, पाचन की कमजोरी, लीवर के रोग, चर्म रोग, मेनिन्जाइटिस, हृदय के वाल्वों की  बीमारियां आदि आदि रोग पैदा होने की सम्भावना बनी रहती है /

तीसरा कारण जैसा की ऊपर बताया गया है affection by SKIN ROUTE  यानी कि चर्म के द्वारा रोगों का शरीर में प्रवेश / इसमें बाहरी दुनिया में रहने वाले बहुत से वाइरस, बैक्टीरिया, पैरासाइट्स, फन्गस आदि शरीर को प्रभावित करते है /

बच्चे बहुत सम्वेदन्शील होते है और जल्दी ही मौसम से प्रभावित होते है इसीलिये उनको CARE करने की अधिक आवश्यकता होती है /  शुरूआत के कुछ महीने और कुछ साल बच्चों की केयर करने की बहुत जरूरत होती है /

आयुर्वेद की ” शास्त्रोक्त घून्टी ” नियमित रूप से देना बच्चों के लिये हितकारी है / इससे उनकी immunity  और शरीर की general health condition  सुधरती है / आयुर्वेद के “शास्त्रोक्त काजल ” का अन्खों मे नियमित प्रयोग करने से बच्चों की गले तथा नेजल साइनस की तकलीफों से छूटकारा मिल जाता है और यह तकलीफें बच्चों को जल्दी जल्दी नहीं होती है /

बहुत से लोगों ने यह ध्यान दिलाया है कि आधुनिक चिकित्सक बच्चों के परिजनों को “काजल” लगाने से मना करते है और आधुनिक चिकित्सक समाज यह कहता है कि बच्चों को काजल नहीं लगाना चाहिये / इस सम्बन्ध मे मैने बहुत खोज की है लेकिन यह आधार मुझे गलत लगा है / अभी तक विश्व के किसी भी देश में ऐसा कोई शोध कार्य नहीं हुआ है जिससे काजल के प्रभाव का किसी भी स्तर पर शोध किया गया हो / इसलिये यह धरणा कि बच्चों को काजल नही लगाना चाहिये , केवल मात्र काजल लगाने को लेकर एक मिथ्या प्रचार है /

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