Scientific Ayurveda

LEUCODERMA / VITILIGO / SAFED DAAG ; CURE OF A FEMALE CASE


A lady aged 45 years have been cured from LEUCODERMA / WHITE SPOTS/ SAFED DAAG by AYURVEDIC TREATMENT based on ETG AyurvedaScan findings and other innovative examination procedures like Ayurveda Blood Examination and Ayurveda Urine Examination and Ayurveda Thermal Scanning invented by our research center at KANPUR, UP, INDIA.

Photographic evidence shows the progress of cure, shooted time to time according to the need , here is shooted phorographs of begginning and end of the cure process.
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The above and many other photographs are taken time to time for evidencing the process of cure by Ayurvedic medications and management accordingly mentioned in Ayurvedic classics.
She was having white spots almost upper and lower extremeties, corners of lips, below nose and some other sites of body parts.

Below photograph is taken recently, which is showing the complete cure of the LEUCODERMA / WHITE SPOTs PROBLEMS, which she have yester years, now is totally cured by AYURVEDA treatment.
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LATEST Technology of Ayurveda ETG AyurvedaScan bases treatment always fruitful and result oriented in LEUCODERMA DISORDERS.

गर्मी से कफ दोष के पीड़ित रोगियों को कैसे राहत मिलती है ? ETG AyurvedaScan studies shows , how KAPHA dosha is cured by PITTA dosha, at the commencement of SUMMER SEASON


CONTACT ; Dr D.B.B.ajpai, Ayurvedic Diagnostician and Inventor & Chief ETG AyurvedaScan Investigator, KANPUR Mobile; 09336238994

CONTACT ; Dr D.B.B.ajpai, Ayurvedic Diagnostician and Inventor & Chief ETG AyurvedaScan Investigator, KANPUR Mobile; 09336238994

आयुर्वेद चिकित्सा विग्यान बताता है कि किस सीजन में कौन सा दोष कुपित होता है अर्थात बढता है और यह बढे हुये दोष किस सीजन में कम हो जाते हैं /

जाड़ा अथवा ठन्डक के दिन “कफ” दोष को बढाते हैं , ऐसा आयुर्वेद का सिध्धान्त कहता है / कफ दोष चूकि जल और आकाश के योग से मिलकर बना है, इसलिये यह शरीर में ठन्ड अथवा शीत के कारण बढता है और शरीर में कुपित होता है / ठन्ड अथवा शीत का प्रभाव गर्मी से कम होता है अथवा गर्म पदार्थ अथवा गर्म मिजाज के खाद्य पदार्थों के खाने से ठन्डक का प्रभाव शरीर को बचाता है / इसीलिये ठन्डक वाले शीत प्रधान देशों में गर्म पदार्थ खाने का रिवाज है जैसे विभिन्न प्रकार के मान्स खाना या शराब पीना ताकि शरीर को ठन्डक से बचने के लिये जरूरी उष्मा मिलती रहे /

रहन सहन के स्तर पर शरीर को गर्म रखने के लिये रहने के स्थान को गर्म बनाये रखने का रिवाज है / इसी कारण ठन्ड पड़ने वाले मुल्कों मे लोगों के मकान शीत प्रतिरोधी होते हैं / भारत में जहां जहां शीत अधिक पड़ती है जैसे हिमान्चल प्रदेश अथवा उत्तरान्चल प्रदेश अथवा काश्मीर जैसे इलाकों में ठीक वही स्तिथि है जैसी कि ठन्ड पड़ने वाले देशों में है /

फिल हाल बात करते हैं कफ दोष की / लुब्बेलुआब यह है कि ठन्ड से कफ दोष बढता है तो उसकी काट करने के लिये गरंम पदार्थॊ का सेवन , गरम जगह रहने और सोने का इन्तजाम करना होता है जिससे “क्फ” दोष शान्त होकर स्वास्थय को नार्मल कर देता है / लेकिन जिनको बहुत अधिक कफ की तकलीफ हो जाती है जैसे बृध्धावस्था का कफ की बीमारी, तब गर्मी का सीजन आरोग्य प्राप्ति के दॄष्टिकोण से सबसे अच्छा होता है / जितनी ही अधिक गरमी पडेगी कफ सम्बन्धित विकार शान्त होते है / इसका कारण यह है कि ठन्ड से पित्त की गर्मी उतनी नहि हो पाती जितने मे वह शरीर को गर्म रख सके / गर्मी के सीजन में कम्जोर पित्त सबल हो जाता है और इसी कारण से कफ सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है /

चूकि रन्जक पित्त दोष-भेद लीवर और तिल्ली को प्रभावित करता है ्तथा इसके साथ ही भ्राजक पित्त सम्पूर्ण शरीर को प्रभावित करता है इससे कफ दोष को शान्त करने मे मदद मिलती है /

ई०टी०जी० आयुर्वेदास्कैन के डाटा के अध्ध्यन से यह पता चला है कि जब भ्राजक पित्त सामान्य से अधिक हो जाता है और Nervous system में Parietal Brain का measurement कम होता है तो व्यक्ति को “Exposure of Cold” अधिक होता है और उसे Thermal Sensitivity का जिस intensity का mesurement डाटा प्राप्त होता है उसी हिसाब से उसको Cold अथवा Heat का exposure होता है /

दान्तों तथा मसूढों और मुख के अन्दर के तमाम विकारों के लिये आयुर्वेद का दन्त मन्जन ; Ayurvedic Tooth Powder for Dental and Oral Problems


आयुर्वेद पूर्ण चिकित्सा विग्यान है / आदि काल से हमारे चिकित्सा पूर्वजों ने समाज को स्वस्थय बनाये रखने के लिये बहुत से नुस्खे लिपिबध्ध करके दिये है , जो आज भी उसी तरह से कारगर और प्रभावशाली है, जैसे उस समय थे /

दान्तों के रोगों के उपचार के लिये आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रन्थों में प्राय:
सभी आचार्यों ने जितना भी अनुभव और ग्यान प्राप्त किया था , उसका वर्णन बहुत सूच्छमता के साथ किया है /

चिकित्सा चन्द्रोदय़ चिकित्सा ग्रन्थ में दान्त के रोगों के लिये एक नुस्खा दिया गया गया है, जो दान्त की बहुत सी बीमारियों में बहुत प्रभाव शाली साबित हुआ है / यह बहुत सरल और सफल योग है /

योग मे निम्न काष्ठौशधियों का मिश्रण है /

मिश्रन; हरड़, बहेडा, आमला, सोन्ठ, काली मिर्च, छोटी पीपल, शोधित तुथ्थ, सेन्धा नमक, रूचक नमक, विड नमक, पतन्ग, माजूफल , ये सब द्रव्य बराबर बराबर मात्रा मे लेना चाहिये / इन सभी द्रव्यों को महीन कूट पीसकर पाउडर जैसा बना लेना चाहिये और बाद में मैदा छानने वाली चलनी से छान लेना चाहिये और किसी एयर टाइट डिब्बे में बन्द करके रख लेना चाहिए /

उपयोग के लिये किसी छोटे प्लास्टिक के डिब्बे या कान्च की शीशी में इस चूरन को रख लेना चाहिये /

एक ग्राम चुर्ण को लेकर दान्तों में मलना चाहिये / जो ब्रश से इस मन्जन को लेकर उपयोग करना चाहे वे ब्रश के साथ इसे दान्तों में मल सकते है / जिन्हें दान्तों मे दर्द हो, मसूढों मे दर्द हो, जिनके दान्त सेन्सिटिव हो गये हों, ठन्डा या गरम पानी लगता हो, या हवा या छूने से दर्द होता हो या दान्तों की अन्य कोई तकलीफ हो , उन सबमे यह दन्त मन्जन असर करक है /

मन्जन करते समय यदि इसमें एक बून्द “नीम का तेल” मिला लें और फिर मन्जन करें तो मुख रोग के लिये यह एक उत्कृष्ठ औषधि हो जाती है /

जिनके दान्त कमजोर हो गये हैं , मसूढॊ के विकर हों, पायरिया से पीडित हों , दान्त हिलने लगे हों और जड़ से कमजोर हो रहे हों, उनको यह मन्जन अवश्य उपयोग में लेना चाहिये /

नीम के तेल को इस मन्जन में मिला लेने से यह मन्जन दान्तों के सभी प्रकार के infection को दूर कर देता है, दान्तों में लगे हुये कीड़ों को यह नष्ट कर देता है /

इस मन्जन को ब्रश से न लगाकर यदि उन्गलियों से मन्जन करते है तो अधिक फायदा करता है और शीघ्र लाभकारी है /

विटामिन की गोलियां खाने से कोई फायदा नहीं


यह हम नहीं कह रहे है, यह कह रहे है ब्रिटॆन के चिकित्सा शोध कर्ता / प्रकाशित खबर को पढ ले , आपको जानकारी हो जायेगी /

हम पहले भी कई बार कह चुके है कि विटामिन के अधिक उपयोग से शरीर मे “हाइपर विटमिनोसिस” की स्तिथि पैदा हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप बहुत सी ऐसी बॊमारियां हो जाती है, जो बाद में असाध्य रोगॊ की श्रेणी में शुमार होने लगता है /

LEUCODERMA CURE of a Medical Student [Allopathy] ; ETG AyurvedaScan report based AYURVEDIC Treatment relieved her other complaints including VITILIGO


 
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An Allopathy Medical student consulted me for her LEUCODERMA problem on 6th February 2011. I recorded her ETG AyurvedaScan and the treatment was given her on the basis of the findings of the ETG report. The same day a Photo of the one part of the VITILIGO was taken by me for record purposes. The following PHOTO shows the anomaly.

She was having white patches on both the Lower Extremeties and some smaller ones on her back , Torso and her genital parts etc etc

See, observe and compare the PHOTOS taken after a few months period.

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Right Lower Extremity -  Right Leg white patches

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Right Lower Extremity - Right Leg white patches

COMPARE PHOTO RIGHT LEG White PATCHES from below PHOTO;

This Photo was taken on  29th May 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the  RIGHT  Lower Extremity -  Leg white patches, see the changes in color of white patches

This Photo was taken on 29th May 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the RIGHT Lower Extremity - Leg white patches, see the changes in color of white patches

 LEFT LEG Comparison ;

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the  Left  Lower Extremity -  LEFT Leg white patches

This Photo was taken on 6th February 2011 on her first visite to clinic. This is the Left Lower Extremity - LEFT Leg white patches

This Photo was taken on 29th MAY 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the  LEFT  Lower Extremity -  Leg white patches, see and compare the changes in colour of white patches

This Photo was taken on 29th MAY 2011 on her follow-up visite to clinic. This is the LEFT Lower Extremity - Leg white patches, see and compare the changes in colour of white patches

 
CONCLUSION; Leucoderma and all disease conditions can be well treated with expertise way, if the AYURVEDIC Treatment is taken after ETG AyurvedaScan findings. Cure can be asured af all the bodily ailments, whatever they may be lebelled or nomenclature.
 
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ETG AyurvedaScan recorded traces of a case of CARDIAC SURGERY including grafting of arteries ; Impacts on body due to changes of Electrical behaviour


This is a case of Open Heart CARDIAC SURGERY including grafting of arteries, done eight years back.

The patient originally belongs to Ahamadabad , Gujarat and he came to his relative  at Kanpur during HOLI vacation, , where he heared about the newly invented Ayurveda technology ETG AyurvedScan by his relations.

When I recorded his ETG traces, it was an amazing  and wonderful experience to me at academic level in view of research , which  is unusual, rare and very peculiar.

OBSERVATION of the recorded traces;

1- See minutely the recorded traces and observe the ELECTRICAL BEHAVIOUR  of the patient, which is very peculiar

2- The ELECTRICAL BEHAVIOUR  is not met with the parameters of general recorded traces and in view of NORMAL ELECTRICAL BEHAVIOUR  of human body. 

3- In this case, we have observed that in every second and in every heart beat in “e” recorded trace, the waves “c” “d” “e” “s” are at one time in ‘upward’ [positive] direction and at the immediate next movement in  ‘downward’ [negative] defelection shows.

 4- The same lead shows absence of “c” wave in upward trace and “e” wave in down trace.

 5- The electrical behaviour of this patient is in ‘clock like direction’ that means the flow of body current is from right to left in circular nature. 

6- Due to frequentaly and second to second, electrical behaviour changes in body , patient have sudden HIGH and sudden LOW Blood pressure, which causes him uneasiness and uncomfort in his daily work. He is not able to sleep well in night and move in nightoff and on, when all members of his family sleeps.

 Many more anomalies have developed with the patient, which was not to patient earlier.

Below is the followup ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

 Obsrvation with the comparision of the earlier recorded trace shows tremendous changes in the traces recorded afterwards.

First Follow-up ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

First Follow-up ETG AyurvedaScan , recorded on 20 / 08 /2011. See and observe the changes in Electrical Behaviour of the patient.

 Obsrvation with the comparision of the earlier recorded trace shows tremendous changes in the traces recorded afterwards.

On 20 March 2011, when patient first visited in clinic , he gave the following complaints, which developed  after cardiac surgery . 

  1. 1.     Fever always persisted in between 99 F to 100 F degree.  After five months Ayurvedic treatment , fever is cured. No problem again reappeared.
  2. 2.     Rapid respiration , severe Dyspnea on least movement, even moving body and changing postures. After five months Ayurvedic treatment , resoiratory problem is cured. No problem again reappeared.
  3. 3.     Lumber pain since 7 years, now cured
  4. 4.     Gaining weight after cardiac surgery , which was 90 kgs on 20/08/2011. Now after five month the weight is 83 kgs.
  5. 5.     Swelling in whole body, now he have no swelling in his body
  6. 6.     Severe constipation and goes for stool after two / three days, now he is going daily stool. No constipation.
  7. 7.     Infection in blood was present before five months, now presently have no infection

 On 20th August 2011, patient followup was recorded. Patient belongs to Ahamadabad , Gujarat. He was happy with his progress of his problem aroused after grafting of artery in his heart.

 Conclusion; In conclusion, it shows that ETG AyurvedaScan system is beneficial on those disease conditions , where it is supposed no treatment. The patient is again given a fresh prescription on the new findings of the ETG report.

An ETG AyurvedaScan Tracings of 22 years old lady suffering from HYSTERIA disorders


This is a case of a 22 years old lady suffering from HYSTERICAL FITS, when she was 15 years old. She belongs to FAIZABAD district of UP. Her elder sister is suffering from LEUCODERMA disorders of whole body and is recovering with the black colors of the skin by my treatment basing on the line of the findings of ETG AyurvedaScan.

Seeing recovery of the disease condition of her elder sister’s LEUCODERMA and allied complaints, which is said an INCURABLE disease  and was maltreated earlier, her gaurdians decided to treat the lady by me. Her ETG AyurvedaScan was done. 

See and observe the above three traces, which provides the data of the complaints she have.

“a” trace is showing the tendency of LOW BLOOD PRESSURE and an acute sudden attack of anxiety, while traces were recorded. See the gaps of the waves, tall peaked waves at one instance have a gap of 15 , comparatively other one is having 17.5

“b” trace is showing the similar trend

“c” trace is showing the internal activity of BRAIN , marked arrow shows the abnormal waves pattern than recorded regular, sudden brain excitement changes the electrical behaviour of the visceral activities

Lady is suffering from Hysterical fits, when she was 15 years old. She took Allopathic treatment, Ayurvedic treatment and Homoeopathic treatment without any result,

Today, on 16 March 2011 her ETG AyurvedaScan recorded and we have studied that she is having more anomalies , which triggers her complaints.

We are starting treatment and time to time we will provide the progress of the patient for entire readers.

Second visute on SUNDAY,03rd April 2011 ; After 15 days Ayurvedic medicines intakes, she have almost no attack of HYSTERICAL FITS, while it was common to her  earlier that she have attack of the HYTERIA after two or three days.

She have again taken 15 days Ayurvedic medicine and we are watching the further followup.

Next followup on  01 May 2011 ;

The Lady Patient  belongs to FAIZABAD  DISTRICT , her father

came to Kanpur on 01 , May 2011 and collected medicine for further 15 days . Her father narrated to me that she is almost normal except some times she feels unesiness.

I clarified her father that it is due to tendency of the hysterical fits, earlier  she have , therefore due to this tendency , she is feeling uneasiness sometimes. 

“आयुर्वेद का इलाज कितने दिन तक करना चाहिये या किया जाये”,यह सवाल हर मरीज पूछता है What is duration of Ayurvedic Treatment ?


आज से लगभग चालिस पचास साल पहले तक लोग यह सब जानते थे कि आयुर्वेद का इलाज कितने दिन तक किया जाये, क्योंकि उस समय तक चिकित्सा के लिये केवल यही एक्मात्र चिकित्सा विग्यान था , जिसका लगभग सभी भारतीय परिवार उपयोग करते थे / होम्योपैथी अधिक उन्नत अवस्था में नहीं थी और इसे केवल बच्चों के इलाज तक ही सीमित था / यह इसलिये कि बच्चे एलोपैथी या आयुर्वेद की कड़वी दवा खाना पसन्द नहीं करते थे / मजबूरन बच्चों के इलाज के लिये होम्योपैथी की दवाओं का उपयोग करना पड़्ता था /

पुराने समय मे लोग आयुर्वेद के महत्व को समझते थे / इसलिये उनको जानकारी थी कि बीमारी के इलाज में कितना समय लगेगा , बड़े बूढे भी अपने अनुभव से बता देते थे और बता देते थे कि ” हर मर्ज के ठीक होने की एक मियाद होती है” या ” ये तो असाध्य या कष्ट साध्य या याप्य रोग है” या ” यह तो जिन्दगी भर चलने वाला रोग है और अब तो दवाओं के सहारे ही जीवन बिताना पड़ेगा” /

आज के जमाने में यह बताने वाला कोई है ही नहीं, न समझाने वाला कोई है, वजह साफ है , इन सब बातों के बारे मे ग्यान रखने वालों का एक दम अभाव / नतीजा अब यह है कि लोगो को पता ही नहीं कि जब वे बीमार हों तो उनको क्या करना चाहिये ?

मेरे यहां आने वाले मरीज मुझसे पूछते है कि वे कितने दिन आयुर्वेदिक दवा खायें , जिनसे उनकी बीमारी का ठीक ठीक इलाज हो सके / सवाल हर मरीज पूछता है और उसका सवाल पूछना भी जायज है /

आयुर्वेद का इस सम्बन्ध में क्या कहना है, उसे मै सार भाग में और अपने अनुभव को जोड़ कर आप सबके साथ अपने अनुभव को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं /

आयुर्वेद में ऐसा निर्देशित किया गया है कि किसी भी बीमारी का इलाज उसके पैदा होने, देश, काल और वातावरण तथा अन्य अनुकूल या प्रतिकूल परिस्तिथियों के ऊपर निर्भर करता है / इसलिये किसी भी बीमारी का इलाज कुछ घन्टे से लेकर एक दिन या कुछ दिन तक की मियाद मे हो सकता है और कुछ अन्य बीमारियां कुछ दिन से लेकर कई महीने या कई कई साल तक हो सकती है या फिर जीवन पर्यन्त तक /

मैने मानव शरीर में होने वाली बीमारियों का वर्गीकरण निम्न सात कैटेगरी में किया है / मेरे हिसाब से सारी दुनिया के लोग इन्ही सात कारणो से बीमार होते है / ये कारण है ;

१- भौतिक यानी Physical
२- मानसिक यानी Mental
३- इन्फेक्सियस यानी Infections
४- जेनेटिक यानी Genetics
५- ट्राउमैटिक यानी Traumatic
६- ईयट्रोगेनिक यानी Iatrogenic
७- अन्य कारण Others

उपरोक्त श्रेणी को देखने के बाद इस बात का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि बीमारियों का निदान किस श्रेणी के अन्तरगत आता है / फिर इसमें यह तलाश करनी होगी कि जो भी बीमारिया है वे [a] Acute है या [b] Semi acute है या [c] Chronic है या [d] Long lasting Disease condition है /

कितने समय तक आयुर्वेद का इलाज कराना चाहिये, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तकलीफ कैसी है /

१- अगर तकलीफ acute है तो यह कुछ घन्टे में ही दवाओं से response कर जाती है जैसे पेट का दर्द, सिर का दर्द, दान्त का दर्द, वमन होना, हिचकी आना, पेट में ऐठन होना आदि / लेकिन यहां इन सबमे एक फर्क है / अगर दर्द कैन्सर का है, अगर सिर दर्द स्पान्दिलाइटिस या माइग्रेन का है, अगर दान्त का दर्द सड़े  हुये दान्त का है तो फिर मूल रोग की चिकित्सा ही करना एक मात्र उपाय है, / अब इसमे कितना समय लगेगा यह बताना बहुत मुश्किल होता है /

२- अन्य सभी बीमारियों मे आयुर्वेद का निर्देश है कि कम से कम ३० दिन तक दवा करना चाहिये / अगर ३० दिन में लाभ न मिले तो ४० दिन या ६० दिन या ९० दिन या १२० दिन या १८० दिन तक इलाज कराना चाहिये /

३- कुछ बीमारियों ऐसी होती हैं जिनमे समय सीमा सही सही निर्धारित नहीं की जा सकती / इसलिये इनमे देश , काल, परिस्तिथि के अनुसार दवाओं तथा परहेज का निर्धारण किया जाता है, जिसे वैद्य / आयुर्वेदिक चिकित्सक के बिना करना सम्भव नहीं होता है / इस श्रेणी में कष्ट साध्य, अति कष्ट साध्य रोग और असाध्य रोग आते है /

४- सुख साध्य रोग के लिये ऊपर बताई गयी [कालम सन्ख्या -२ ] समय सीमा ठीक और सही अन्कित की गयी है / 

कुछ हद तक Homoeopathic चिकित्सा में भी यही समय सीमा तथा बतायी गयी परिस्तिथियां लागू होती है,  ऐसा मैने अनुभव किया है /

A case of Chronic THROMBOCYTOPENIA ; Reduced Platelet production ; Treated successfully by Ayurvedic medicines on basis of the findings of Electro Tridosha Graphy; ETG AyurvedaScan Report


This is a case of an Allopathic physician aged 60 years, who suffered from Viral Dengue hyperpyrexia and allied syndromes like Muscular-skeletal joints and articulation problems in August, 2006. He took allopathic medicines for his ailments, which relieved his Dengue problem but he suffered from joints and other syndromes.

After Blood pathological examination , this came in his notice that his platelets counts became down upto 15 thousands, a normal count is 1 lack 50 thousands to 4 lack 50 thousand, that created an agony to physician. His Hemoglobin became 6 mg% and for that he required to transfuse blood. He was advised to take 40 milligrams STEROID daily. He was admitted SGPGI Lucknow for three months. The practice of treatment was in run throughout four and half years.

One patient of mine asked the Physician, that Dr DBBajpai is treating patient on the basis of the findings of a newly invented technology ETG, if he desire for Ayurvedic treatment, he should go to Dr Bajpai and consult him.

The physician came to me and narrated his all story, I suggested him to go for an ETG examination.

The following wordsheet will provide all the data.

On the basis of the data, it is concluded that the patient is having , three main problems;

1- Bowel’s pathophysiology is present
2- Hepatospleenomegaly is present
3- Blood anomaly is present

The following Ayurvedic medicines were prescribed;

a- Kutajghan vati one pills
b- Arogyavardhini vati one pills
c- Gandhak Rasaayan one pills

To be taken Morning and Evening one dose daily with plain water

d- Sarivadyaasav 20 milliliters with equal quantity of water after Lunch and after Dinner

Patient was advised to carry treatment 90 days continuous.

On 6th January 2011 , pt came and told me that he is not taking STEROID from last two months and his swelling of whole body is vanished and other syndromes are relieved. His Blood platelets count is now 80 Thousand and he is feeling well than before.

I advised him to carry similar medicines for again 60 days. I told him that medicines will be changed after second ETG AyurvedaScan findings.

Comments; Ayurvedic treatment based on the findings of ETG AyurvedaScan is always fruitful and result oriented, which we have experienced after treating thousands of cases in our practice.

SEXUAL POWER ; Confirmation of Sexual Power intensity of a Human being by Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system


Many persons are willing to know the intensity of their SEXUAL POWER by any source. Till today no machine and mechanical parameters are available to establish sexual power by any technology.

But it is possible today and sexual power can be measured by mechanical means. By virtue of Electro Tridosha Graphy ; ETG AyurvedaScan system, now it is possible to establish the SEXUAL POWER of any human being in measured intensity.

The ETG system measures many parameters systemwise, sectorwise, traces wise, ayurvedic fundamental-wise and so on . PROSTATE health condition is scanned by ETG system. So is of the SAPTA dhatu.

 The SAPTA DHATU of Ayurveda is considered , similar to PATHOLOGY of Modern western medicine. Intensity of Prostate value shows the Sexual Power intensity of a human being, how is the person’s sexual drive. One of the Sapta Dhatu SHUKRA is evaluated and this shows the Quality and quantity of Semen. The passion of sexual ability and erotic sensibility can be measured by correlating to Autonomic nervous system and Brain faculties evaluation. .

In our studies, we have found that persons, which have very low intensity of PROSTATE pathophysiology, say below 30 e.v. , they are almost IMPOTENT and have no sexual desire. Upper signification of the above said parameters, shows intensity of Sexual desire in increasing level upto 90 e.v., which we consider a normal level. Sexual potency increases according to touch level of Normal parameters.

Strong sexual passion and erotic sensibility is seen in those persons, who have 95 e.v. to 99 e.v.

Excessive sexual passion and erotism is seen in those , who have beyond the above said parameter. Those who have 120 e.v. to more upper limit causes more passion to sexual behaviour.

We have seen that some persons have temporary IMPOTENCY, Their above given parameters , when comes in normal limit and when we see that person says that he have no sexual desire, we consider it a temporary and circumstantial problem with the person. It may be happen due to long travels by Railway, by Car or by any means. We have observed that some persons are impotent due to their workings both physical and mental. The re is other reasons, which are varying from person to person.

In these persons we have given Ayurvedic medicine and their impotency is restablished and as usual as it was in earliest forms. Now it is possible to treat either less sexual desire or excessive desire for sexual intercourses by Ayurveda.